टीएमसी के नाम और चुनाव चिह्न पर फैसला करीब, आज होगी अहम सुनवाई
कोलकाता। अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर जारी वर्चस्व की जंग अब अपने सबसे निर्णायक मोड़ पर आ चुकी है। पार्टी के दोनों धड़े आज चुनाव आयोग (EC) के समक्ष उपस्थित होकर संगठन, दल के नाम और आधिकारिक चुनाव चिह्न पर अपना-अपना कानूनी दावा ठोकने के लिए आवश्यक दस्तावेज सौंपेंगे। तृणमूल कांग्रेस के 28 साल के इतिहास में यह पहला ऐसा गंभीर संकट है, जब पार्टी का आंतरिक विवाद इस तरह खुलकर देश की सर्वोच्च चुनाव संस्था के दरवाजे तक पहुंचा है।
चुनाव आयोग ने दोनों पक्षों की शुरुआती दलीलें सुनने के बाद उन्हें 6 जुलाई की शाम 5:30 बजे तक अपनी सांगठनिक ताकत, आवश्यक दस्तावेज और समर्थन से जुड़े पुख्ता प्रमाण पेश करने की अंतिम मोहलत दी थी। इस समयसीमा के समाप्त होने के बाद, अब आयोग दोनों पक्षों के कागजातों की बारीकी से समीक्षा करेगा और फिर अगली विस्तृत सुनवाई के लिए दोनों गुटों को तलब करेगा।
'जोड़ा घास-फूल' सिंबल और संपत्तियों पर नजर
यह खींचतान महज नेतृत्व परिवर्तन तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि पार्टी की पहचान पर कब्जे की होड़ बन चुकी है। दोनों ही धड़े टीएमसी के बेहद लोकप्रिय चुनाव चिह्न ‘जोड़ा घास-फूल’, केंद्रीय कार्यालय, सांगठनिक ढांचे, पार्टी के बैंक खातों और अन्य सभी चल-अचल संपत्तियों पर अपना मालिकाना हक जता रहे हैं। बीते विधानसभा चुनाव में मिली शिकस्त के बाद पनपा यह आंतरिक असंतोष अब पूरी पार्टी को अपने नियंत्रण में लेने की आर-पार की लड़ाई का रूप ले चुका है।
ममता और बागी धड़े की अपनी-अपनी दलीलें
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ममता बनर्जी गुट: सूत्रों के हवाले से खबर है कि ममता बनर्जी के प्रति वफादार गुट की ओर से वरिष्ठ नेता कल्याण बनर्जी दिल्ली में चुनाव आयोग के दफ्तर पहुंचकर दस्तावेज जमा करेंगे। इस गुट का मुख्य तर्क पार्टी की स्थापना, उसका ऐतिहासिक सफर और शुरुआती दौर से संगठन में बनी रही निरंतरता है।
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बागी गुट (ऋतब्रत बनर्जी समर्थक): दूसरी तरफ, बागी धड़े का दावा है कि उन्हें विधानसभा में दो-तिहाई से अधिक विधायकों का स्पष्ट समर्थन हासिल है। इस संबंध में जरूरी कागजात वे पहले ही आयोग को सौंप चुके हैं। उनका सीधा तर्क है कि चूंकि निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का बड़ा बहुमत उनके पाले में है, इसलिए लोकतांत्रिक नियमों के तहत पार्टी पर उनका अधिकार वैध है।
विधायक दल से शुरू होकर संगठन तक पहुंची जंग
शुरुआत में यह विवाद केवल विधानसभा के भीतर नेता चुनने को लेकर पैदा हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे इसने पूरे संगठन को अपनी चपेट में ले लिया। पिछले महीने बागी गुट ने एक समानांतर विशेष बैठक का आयोजन किया था, जिसमें वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को अध्यक्ष चुनते हुए एक नई राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा कर दी गई। बागी धड़े के नेताओं का आरोप है कि वर्तमान शीर्ष नेतृत्व अब अपने ही चुने हुए प्रतिनिधियों का भरोसा पूरी तरह खो चुका है।
बहुमत का गणित और संसद में लगा झटका
बागी गुट ने पहली बार अपनी सांगठनिक ताकत का अहसास तब कराया, जब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष के चुनाव के दौरान टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 58 ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के खिलाफ जाकर ऋतब्रत बनर्जी के पक्ष में खुलकर वोट किया। अब यह बागी धड़ा अपने साथ करीब 65 विधायकों के होने का दावा कर रहा है।
इस आंतरिक कलह की आंच अब दिल्ली (संसद) तक भी पहुंच गई है। काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में टीएमसी के 21 लोकसभा सांसदों ने सामूहिक रूप से नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) की सदस्यता ले ली है। सांसदों के इस बड़े दलबदल से संसद में टीएमसी की स्थिति बेहद कमजोर हो गई है, जिसने इस राजनीतिक और कानूनी लड़ाई को और ज्यादा पेचीदा बना दिया है। फिलहाल, सभी राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें चुनाव आयोग के अगले कदम और आने वाली सुनवाई पर टिकी हैं।






