ईरान-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव से आपूर्ति बाधित , युद्ध का असर: ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए गंभीर जोखिम
एवीएस न्यूज.भोपाल
ईरान-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला को बाधित कर ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर दिया है। कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण ईंधन महंगा होने से इनपुट लागत और लॉजिस्टिक्स खर्च में वृद्धि से वाहन निर्माता कंपनियों पर मार्जिन का दबाव बढ़ेगा।

युद्ध के कारण ब्रेंट क्रूड ऑयल 100 डालर प्रति बैरल के पार जाने की आशंका जताई जा रही है जिससे भारत में पेट्रोल-डीजल, गैस सहित कार, बाइक की कीमतें बढ़ सकती हैं। यह बात भोपाल ऑटोमोबाइल एसोसिएशन अध्यक्ष आशीष पांडेय ने कही। 
पांडेय ने कहाकि युद्ध का असर गाड़ी बनाने वाली कंपनियों के वॉल्यूम पर नुकसान के तौर पर कुछ सीधा असर पड़ने की उम्मीद है, क्योंकि मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ़्रीकी इलाके कुल एक्सपोर्ट वॉल्यूम में 8 से 40 फीसदी का हिस्सा देते हैं। सप्लाई चेन कॉस्ट के बढ़ते दबाव से और भी ज्यादा इनडायरेक्ट असर पड़ने की उम्मीद है। ज्यादातर ऑटो कंपनियों के लिए फ्रेट रेट रेवेन्यू का 1-3 फीसदी के बीच होता है। जिससे मार्जिन पर असर पड़ता है। क्रूड की बढ़ी हुई कीमतें पहले से ही ज्यादा मटीरियल कॉस्ट को और बढ़ा सकती हैं, जिससे ग्रॉस मार्जिन पर असर पड़ सकता है।
टायर प्लास्टिक और पेंट उद्योग को चुकाने पड़ेगी अधिक कीमत
उन्होंने कहाकि एंसिलरी कंपनियों पर सप्लाई चेन में रुकावट बढ़ी है जिससे दूसरे ऑर्डर पर असर पड़ सकता है। टायर प्लास्टिक और पेंट उद्योग जो क्रूड पर निर्भर हैं उन्हें कच्चे माल के लिए अधिक कीमत चुकानी पड़ेगी, जिससे वाहनों के निर्माण की लागत बढ़ेगी।

तनाव लंबा चला तो वाहनों की कीमतों में वृद्धि के सेल्स वॉल्यूम पर पड़ेगा असर
आरएमजे मोटर्स के सुनील जैन 501 का कहना है कि यदि यह तनाव लंबा चलता है तो वाहनों की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना से बिक्री प्रभावित हो सकती है। तेल की कीमतों में तेजी से उत्पादन परिवहन और परिचालन लागत बढ़ेगी, जिससे गाड़ियां महंगी हो सकती हैं। महंगाई बढ़ने से वाहनों की मांग में गिरावट आने की आशंका है , जिससे सेल्स वॉल्यूम पर बुरा असर पड़ेगा।
महंगे होंगे बासमती चावल, रसोई गैस और पेट्रोल-डीजल

जेब पर भी होने वाला है ' महंगाई का अटैक'
ईरान-इजरायल युद्ध से हॉर्मुज जलसंधि में तनाव बढ़ गया है। इससे भारत में पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दाम बढ़ना तय है। साथ ही ईरान को होने वाला बासमती चावल का निर्यात रुकने से किसानों को नुकसान होगा। यह संकट भारत की अर्थव्यवस्था और महंगाई के लिए बड़ी चुनौती है। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में हर 10 डालर प्रति बैरल की बढ़ोतरी भारत के आयात बिल को लगभग13-14 अरब डालर (लगभग 1.15 लाख करोड़ रुपए) बढ़ा देती है। तेल खरीदने के लिए डॉलर की मांग बढ़ेगी, जिससे रुपया कमजोर होगा और ‘इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन’ (आयातित महंगाई) बढ़ेगी। डीजल महंगा होने से ट्रक और लॉजिस्टिक्स का खर्चा बढ़ेगा, जिसका सीधा असर सब्जी, फल और राशन की कीमतों पर दिखेगा।
खेती और व्यापार पर दोहरी मार
यह संकट केवल तेल तक सीमित नहीं है। भारत का कृषि निर्यात भी खतरे में है। भारत के कुल बासमती निर्यात का लगभग 25 फीसदी हिस्सा अकेले ईरान खरीदता है। भुगतान संकट या शिपिंग रुकने से भारतीय किसानों और निर्यातकों के अरबों रुपए फंस सकते हैं। चाय के बागानों से लेकर बंदरगाहों तक, निर्यात की सुस्त रफ्तार भारतीय व्यापारियों की चिंता बढ़ा रही है।

