झील, जमीन और जिम्मेदारी- स्मार्ट डिजिटल राजधानी बनने की राह पर भोपाल
एवीएस न्यूज ..भोपाल
राजा भोज, गोंड शासकों और बेगम शासनकाल की विरासत से सजी भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी है। झीलों, पहाडिय़ों और हरियाली से घिरा यह शहर भौगोलिक रूप से भारत के केंद्र में स्थित है। प्रशासनिक महत्व, प्राकृतिक सौंदर्य और ऐतिहासिक धरोहर के कारण इसमें मिनी कैपिटल से आगे बढक़र अंतरराष्ट्रीय स्तर की स्मार्ट डिजिटल राजधानी बनने की पूरी क्षमता है। फिर भी जमीनी हकीकत यह है कि शहर अनेक संरचनात्मक, प्रशासनिक, पर्यावरणीय और सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहा है। यदि इन मुद्दों का समन्वित समाधान किया जाए, तो भोपाल न केवल राज्य की राजधानी, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर एक आदर्श टेक-गवर्नेंस मॉडल बन सकता है। यह कहना है समाज सेवी और कारोबारी संजीव गर्ग (गांधी) का।

ऐतिहासिक विरासत-संरक्षण और ब्रांडिंग की जरूरत
उन्होंने कहाकि भोपाल का प्राचीन नाम भोजपाल माना जाता है, जिसका संबंध 11वीं शताब्दी में परमार वंश के राजा भोज द्वारा बड़े तालाब (ऊपरी झील) के निर्माण से जुड़ा है। बाद में गोंड शासकों और 18वीं सदी में दोस्त मोहम्मद खान द्वारा स्थापित भोपाल रियासत ने इसे राजनीतिक पहचान दी। बेगम शासनकाल (1819-1926) में बनी ताज-उल-मसाजिद, मोती मस्जिद, गौहर महल, शौकत महल और सदर मंजिल आज भी स्थापत्य कला की मिसाल हैं। 1949 में रियासत का भारत में विलय और 1956 में मध्यप्रदेश की राजधानी बनने के बाद शहर का प्रशासनिक महत्व बढ़ा। भोपाल से 40 किमी के दायरे में सांची स्तूप, भीमबेटका शैलाश्रय (यूनेस्को विश्व धरोहर), उदयगिरि गुफाएं, रायसेन किला, भोजेश्वर मंदिर, सलकनपुर शक्तिपीठ जैसे स्थल मौजूद हैं। बावजूद इसके, विरासत संरक्षण का समग्र मास्टर प्लान और अंतरराष्ट्रीय धार्मिक-ऐतिहासिक पर्यटन सर्किट का विकास अभी अधूरा है।
झीलों और पर्यावरण की चुनौती
उन्होंने कहाकि झीलों का शहर कही जाने वाली राजधानी की पहचान कमजोर पड़ती दिख रही है। बड़े तालाब (भोजताल) में सीवेज प्रवाह, अतिक्रमण और जल-गुणवत्ता की समस्या सामने है। छोटे तालाब, बावडय़िाँ और कुएं उपेक्षित हैं। नर्मदा जल वितरण में असमानता, पार्कों के रखरखाव में कमी, ठोस कचरा प्रबंधन की अपर्याप्त व्यवस्था और हरियाली में गिरावट शहर की पर्यावरणीय चुनौतियाँ हैं। यदि जल-तंत्र का वैज्ञानिक मानचित्रण और संरक्षण मॉडल लागू न हुआ, तो झीलों की विरासत खतरे में पड़ सकती है।
भूमि विवाद और प्रशासनिक जटिलताएं
संजीव गर्ग के अनुसार सैटेलाइट आधारित नपती के बाद वर्षों पुरानी जमीन सीमाओं में बदलाव से खेत, प्लॉट और मकानों के सीमांकन विवाद बढ़े हैं। लाखों भूमि मामले लंबित हैं और वर्षों तक मुकदमे चलने के बाद भी समाधान नहीं हो पा रहा। फास्ट ट्रैक भूमि न्यायाधिकरण का अभाव आम नागरिकों को आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान कर रहा है। रजिस्ट्री फीस अधिक होना, विवादित भूमि की भी रजिस्ट्री, अवैध कॉलोनियों पर समय पर रोक न लगना और विभागीय तालमेल की कमी प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रश्न खड़े करती है।
उद्योग, रोजगार और आर्थिक आधार
राजधानी होने के बावजूद भोपाल में बड़े उद्योगों और औद्योगिक कॉरिडोर का अभाव है। आईटी पार्क सीमित हैं, स्टार्टअप इकोसिस्टम अभी शुरुआती स्तर पर है। बड़े शिक्षा एवं रिसर्च संस्थान और सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों की संख्या भी सीमित है। व्यापार, शादी और शॉपिंग के लिए इंदौर पर निर्भरता और गंभीर इलाज हेतु मुंबई या दक्षिण भारत जाना आम प्रवृत्ति है। इससे स्पष्ट है कि आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस नीति की जरूरत है।
क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और परिवहन
उन्होंने बताया कि भोपाल को क्षेत्रीय आर्थिक केंद्र बनाने के लिए सीहोर, ओबेदुल्लागंज, विदिशा, रायसेन और कुरावर को जोडऩे वाला रिंग कॉरिडोर आधारित मिनी मेट्रो या लोकल ट्रेन मॉडल प्रभावी हो सकता है।अंतरराष्ट्रीय उड़ानों की कमी और कई बड़े शहरों के लिए सीधी फ्लाइट न होना भी विकास में बाधा है। मुंबई के लिए तेजगति ट्रेन और धार्मिक पर्यटन स्थलों-नाथद्वारा, द्वारका, खाटू, तिरुपति से सीधी कनेक्टिविटी से राजधानी का महत्व बढ़ सकता है।
आधारभूत और सामाजिक ढांचे की कमियां
उन्होंने कहाकि आधारभूत और सामाजिक ढांचे के कमियों के बारे में कहाकि शहर में मल्टीलेवल पार्किंग, अंतरराष्ट्रीय एक्सपो सेंटर, फिल्म सिटी, वाटर पार्क और सुव्यवस्थित गौशाला परिसर का अभाव है। भूमिगत विद्युत केबल और सीवर नेटवर्क भी पूर्ण रूप से विकसित नहीं हैं। झुग्गियां, बाजारों में अतिक्रमण, खुले में मांस विक्रय, चौराहों पर बच्चों से भीख मंगवाने वाले गिरोह, महिला हॉस्टल सुरक्षा की कमी और सीमित सीसीटीवी नेटवर्क सामाजिक चुनौतियाँ हैं। गड्ढेदार सडक़ें, खुली नालियां और टूटे चैंबर नागरिक संरचना की कमजोरी दर्शाते हैं।
क्षमता अपार, आवश्यकता निर्णायक क्रियान्वयन की
भोपाल में इतिहास है, प्राकृतिक सौंदर्य है, धार्मिक-पुरातात्विक विरासत है और रणनीतिक भौगोलिक स्थिति है। कमी केवल दीर्घकालिक दृष्टि, पारदर्शी भूमि सुधार, निर्णायक क्रियान्वयन और समन्वित विकास नीति की है। यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक पारदर्शिता और तकनीकी नवाचार के साथ योजनाबद्ध तरीके से काम किया जाए, तो भोपाल न केवल मध्यप्रदेश की राजधानी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर की स्मार्ट, डिजिटल और सांस्कृतिक राजधानी बन सकता है।

