पेप्सीको ने मप्र की धुबदी बाई और गुरु पवार को किया ‘वॉइसेज़ ऑफ हार्वेस्ट अवॉर्ड्स 2025’ से सम्मानित
एवीएस न्यूज.भोपाल
मध्य प्रदेश के दो प्रेरणादायी योगदानकर्ताओं बड़वानी जिले की धुबदी बाई सोलंकी और छिंदवाड़ा जिले के गुरु पवार को नई दिल्ली में आयोजित पेप्सीको इंडिया के ‘वॉइसेज़ ऑफ हार्वेस्ट कॉन्फ्रेंस एंड अवॉर्ड्स 2025’ में सतत एवं तकनीक-आधारित कृषि में उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित किया गया।
उल्लेखनीय उपलब्धियों के लिए धुबदी बाई सोलंकी को “रिजेनेरेटिव एग्रीकल्चर चैंपियन अवॉर्ड” तथा गुरु पवार को “डिजिटल एग्री एक्सीलेंस अवॉर्ड” से नवाजा गया।
अपने ‘पार्टनरशिप ऑफ प्रोग्रेस’ फिलॉसफी के मार्गदर्शन में, पेप्सिको इंडिया ने भारतीय कृषि में सतत परिवर्तन लाने वाले व्यक्तियों का सम्मान करने के लिए ‘वॉइसेज़ ऑफ हार्वेस्ट अवॉर्ड्स 2025’ का दूसरा संस्करण आयोजित किया। देशभर से 10 किसानों को उनके नेतृत्व, नवाचार और सामुदायिक प्रभाव के लिए सम्मानित किया गया। इनका चयन कृषि विशेषज्ञों की एक बाहरी जूरी द्वारा कठोर मूल्यांकन प्रक्रिया के माध्यम से किया गया।
धुबदी बाई सोलंकी और गुरु पवार को मुख्य अतिथि भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री माननीय श्री शिवराज सिंह चौहान द्वारा सम्मानित किया गया। उन्होंने अपने संबोधन में कहा, “हमारे लिए किसान केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि जीवनदाता हैं, जो हमारे राष्ट्र की शक्ति का मूल स्रोत हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में, हम खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने, उत्पादकता बढ़ाने, मृदा स्वास्थ्य सुधारने और किसानों की आय सुरक्षित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हमारा मिशन स्पष्ट है: भारत को विश्व का खाद्य भंडार बनाना, साथ ही आने वाली पीढ़ियों के लिए हमारी भूमि का संरक्षण करना। हमारे किसानों की सेवा करना हमारी राष्ट्र की सबसे बड़ी सेवा है और हमेशा रहेगी।”
धुबदी बाई सोलंकी के बारे में
बड़वानी जिले के ओसाड़ा गाँव की किसान धुबदी बाई सोलंकी ने कृषि में चार दशक बिताए हैं और पुनर्योजी सिद्धांतों पर आधारित एक सुदृढ़ और टिकाऊ कृषि प्रणाली का निर्माण किया है। वह कभी बाजरा और ज्वार की वर्षा-आधारित, निर्वाह-स्तर की खेती पर निर्भर थीं, लेकिन उनकी परिवर्तन यात्रा एएसए द्वारा समर्थित एक खुदे हुए कुएँ के निर्माण से शुरू हुई, जिसने उनके 7 एकड़ के खेत के लिए जल सुरक्षा सुनिश्चित की। इस हस्तक्षेप ने उन्हें पारंपरिक तरीकों को छोड़कर, बहु-फसलीकरण, वैज्ञानिक सिंचाई, और कपास व मूँगफली की विविध खेती की ओर बढ़ने में सक्षम बनाया।
जैविक और रसायन-मुक्त खेती को अपनाते हुए, उन्होंने लगातार खेत की खाद का उपयोग करके मिट्टी की उर्वरता को मजबूत किया, जिससे मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ की वृद्धि हुई और नमी धारण करने की क्षमता बढ़ी। पुनर्योजी तरीकों को अपनाने से सामूहिक रूप से मिट्टी की जैव विविधता और खेत का लचीलापन बढ़ा है।
पुनर्योजी कृषि पद्धतियों का उनके जीवनयापन पर परिवर्तनकारी प्रभाव पड़ा है। 2022 से पहले मजदूरी से सालाना ₹50,000-60,000 कमाने वाली धुबदी बाई अब प्रति वर्ष ₹5 लाख से अधिक कमाती हैं। उनकी भूमि की उत्पादकता बढ़ी है, उनकी आय साल भर स्थिर हुई है, और वह एक मजबूत ग्रामीण उद्यमी के रूप में उभरी हैं। उनका खेत अब पुनर्योजी कृषि के लिए एक प्रदर्शन स्थल के रूप में कार्य करता है, जहाँ वह नियमित रूप से किसानों को खाद बनाने, मिट्टी प्रबंधन और जैविक तकनीकों पर प्रशिक्षण देती हैं। उनके काम ने पूरे समुदाय में एक सकारात्मक प्रभाव डाला है, जिसने कई लोगों को इसी तरह की टिकाऊ पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रेरित किया है।

