खाद्य पदार्थों में मिलावट और रासायनिक खाद -कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग तथा प्रदूषण के चलते स्वास्थ्य समस्याएं लगातार बढ़ रही है,जिससे हर आयु वर्ग का व्यक्ति इन कारकों से प्रभावित है

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चरणसिंह चौहान. भोपाल  
खान-पान की आदतों में प्रतिकूल बदलाव, खाद्य पदार्थों में मिलावट और रासायनिक खाद-कीटनाशकों का अंधाधुंध उपयोग तथा प्रदूषण के चलते स्वास्थ्य समस्याएं लगातार बढ़ रही है। हर आयु वर्ग का व्यक्ति इन कारकों से प्रभावित है, सर्वाधिक बुरा असर बच्चों पर पड़ रहा है। इसलिए स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता और खान पान की आदतों में बदलाव बहुत जरुरी है। यह कहना है कि द मेदांता मेडिसिटी गुरूग्राम में बाल रोग विभाग की एचओडी और देश की ख्याति प्राप्त बाल रोग एवं लिवर ट्रांसप्लांट विशेषज्ञ डॉ. नीलम मोहन का। 

 


डॉ. नीलम मोहन के नेतृत्व में अब तक 500 से अधिक बाल मरीजों के सफल लिवर ट्रंसप्लांट 
भारत में बच्चों के लिवर ट्रांसप्लांट शुरू करवाने का श्रेय उन्हें जाता है। कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित डॉ.नीलम मोहन के नेतृत्व में अब तक 500 से अधिक बाल मरीज सफल लिवर ट्रांसप्लांट करवा चुके हैं।   वर्ष 2026 के लिए उन्हें इंडियन एकेडमी आफ पीडियाट्रिक्स (आईएपी) का नेशनल प्रेसीटेंड चुना गया है। बाल रोग विशेषज्ञों की कार्यशाला में भोपाल आर्ई डॉ. नीलम मोहन ने बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की। 
 प्रस्तुत हैं द मेदांता मेडिसिटी गुरूग्राम में बाल रोग विभाग की एचओडी डॉ. नीलम मोहन से चरण सिंह चौहान के साथ हुई चर्चा के प्रमुख अंश.......
 

बच्चों में भी फेटी लिवर सहित अन्य तरह की दिक्कतें बढ़ रही है। कई बार लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ रही है?
- फूड हैबिट इसका सबसे बड़ा कारण है। एक तरफ कुपोषण है तो दूसरी तरफ मोटापा बढ़ रहा है। खानपान के मामले में हमारा व्यवहार गलत है। हमें पता ही नहीं है बच्चों को क्या खिलाना है और क्या नहीं। इसके लिए पेरेटिंग सीखने की जरूरत है।
बच्चों के लिए सही खानपान क्या है?
- शुगर, मैदा, ट्रांसफेड, बेकरी आयटम से बचाना पड़ेगा। बच्चों को नेचुरल खिलाएं. फल-सब्जी, नट्स, मिलेट्स,. घी, दूध, आलिव आयल सहित वेजीटेरियल में ढेर सारी बैरायटी है खाने के लिए तो फिर जंग फूड और पैकेज्ड फूड क्यों ? बच्चों में शुरूआत ही से नेचुरल खानपान की आदत डाली जाना चाहिए। अनहेल्दी फूड से व्यक्तिगत तौर पर आसानी से बचा जा सकता है, इसमें दिक्कत कहां है। केवल जागरूकता की जरूरत है। खुराक पर शुरू से ही ध्यान दिया जाना चाहिए। किशोरी बालिकाओं में एनीमिया न हो, बाद में जब मां हेल्दी तो बेबी हेल्दी होगा। मां का खानपान नेचुरल होगा तो बेबी का खानपान भी इसी तरीके से करवा सकेगी।
डिजिटलाइजेशन का भी सेहत पर असर पड़ रहा है?
- बिलकुल, मोबाइल और सोशल मीडिया के कारण फिजिकल एक्टिविटी नहीं हो पा रही है। नींद पूरी नहीं हो पा रही, स्ट्रेस बढ़ रहा है, मेटाबॉलिज्म गड़बड़ा रहा है इसका सीधा असर शारीरिक के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी पड़ रहा है।
भारत में लिवर ट्रांसप्लांट बहुत महंगा है और यह सुविधा देश के चुनिंदा अस्पतालों में ही उपलब्ध है?
-द मेदांता मेडिसिटी गुरूग्राम में 16-17 लाख में हो जाता है, यह विश्व स्तरीय संस्थान है, लिवर ट्रांसप्लांट का सक्सेस रेट 95 प्रतिशत है। जबकि अमेरिका में यह एक करोड़ से ज्यादा का पड़ता है। इसे पब्लिक हेल्थ में लाने के लिए काम करने की जरूरत है क्योंकि इसमें एक पूरी टीम तथा विशेष संसाधनों की जरूरत पड़ती है। 
राष्ट्रीय औसत की तुलना में एमपी में बाल मृत्यु दर ज्यादा है, कैसे कम हो?
सब कुछ सरकार पर छोड़ दिया जाता है, यह सही नहीं है। इसके लिए कम्युनिटी को जिम्मेदार बनाना होगा, एनजीओ को जोडऩा होगा। 
आईएपी की नेशनल प्रेसीडेंट होने के नाते चाइल्ड हेल्थ केयर में क्या बदलाव करेंगी?
एक ऐप बनाया है जिसके 90 लाख फालोअर्स है। हर बाल रोग विशेषज्ञ के मोबाइल में यह ऐप होगा। उपचार या टीकाकरण के लिए आने वाले हर पेशेंट को उपचार के साथ साथ खान-पान संबंधी परामर्श भी दिया जाए। इसके अलग अलग माड्यूल बनाए हैं जैसे बच्चे को छह माह से 2 साल तक, दो साल से पांच साल तथा पांच से 10 साल के बीच वैलेंस डाइट क्या हो। हर टीचर्स को यह समझाना है। क्योंकि विकसित भारत 2047 को जो आगे ले जाएगा उस नींव का मजबूत होना बेहद जरूरी है।