एमेज़ॉन भारत का सबसे भरोसेमंद ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म बनकर उभरा, जबकि इस सेक्टर में डार्क पैटर्न हावी है - डेटम इंडेक्स
एवीएस न्यूज. गुरुग्राम
भारत में तेजी से बढ़ते डिजिटल कॉमर्स के ईकोसिस्टम को काफी वित्तीय घाटे का सामना करना पड़ रहा है। इसका कारण है भ्रामक इंटरफेस डिज़ाईन, जिन्हें ‘‘डार्क पैटर्न’’ के रूप में जाना जाता है।
डेटम इंटैलिजेंस की ‘‘डार्क पैटर्न्स इन इंडियाज़ ऑनलाईन मार्केटप्लेसेज़’’ रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय ग्राहकों को डार्क पैटर्न की वजह से हर साल 25,000 करोड़ रुपये से 28,000 करोड़ रुपये तक का नुकसान हो रहा है। देश के 304 मिलियन ऑनलाईन खरीददारों में से 88 प्रतिशत को प्रतिमाह औसतन 78 रुपये से 87 रुपये का नुकसान होता है।
यह सर्वे साल 2026 की पहली तिमाही में 50 शहरों के 2,590 से अधिक ग्राहकों के बीच किया गया। इसमें क्विक कॉमर्स, ई-कॉमर्स और ऑनलाईन ट्रैवल में 12 मुख्य प्लेटफॉर्म्स के बारे में सवाल पूछे गए थे। सर्वे में डार्क पैटर्न, ग्राहकों पर उनके वित्तीय प्रभाव और विश्वास उनके असर का आकलन किया गया। सर्वे में सामने आया कि सबसे अच्छा और सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले प्लेटफॉर्म्स के बीच 92 पॉईंट का अंतर है।
सर्वे के मुख्य नतीजे हैं: एमेज़ॉन भारत के सबसे भरोसेमंद ई-कॉमर्स मार्केटप्लेस के रूप में उभरा। 50 प्रतिशत ग्राहकों ने इसे सबसे विश्वसनीय प्लेटफॉर्म माना। इसके विपरीत, फ्लिपकार्ट, मिंत्रा और नाईका के प्रति ग्राहकों में अविश्वास रहा। फ्लिपकार्ट के लिए विश्वास और अविश्वास का अंतर सबसे कम रहा। 41 प्रतिशत ने इसे सबसे कम विश्वसनीय माना, जबकि 37 प्रतिशत ने इसे विश्वसनीय माना। इसकी वजह हर लेन-देन में ज्यादा पैसा वसूलना है।
ऑनलाईन ट्रैवल में मेकमाईट्रिप को सबसे सुरक्षित प्लेटफॉर्म माना गया, जबकि क्लियरट्रिप सबसे अधिक नुकसानदायक प्लेटफॉर्म्स में से एक रहा। क्विक कॉमर्स में डार्क पैटर्न एक्सपोज़र के लिए सबसे खराब स्कोर बिग बास्केट का रहा। इसकी वजह से केवल नुसान ही नहीं हो रहा है, बल्कि ग्राहकों के व्यवहार में बड़ा बदलाव भी हो रहा है। अविश्वास के कारण ग्राहक खर्च में कमी ला रहे हैं, ज्यादा गहराई से तुलना कर रहे हैं और प्लेटफॉर्म को स्विच कर रहे हैं, जिससे 55,000 करोड़ रुपये से अधिक की ग्रॉस मर्चेंडाईज़ वैल्यू (जीएमवी) खतरे में है।
अध्ययन में सामने आया कि भारत में 304 मिलियन ऑनलाईन शॉपर्स में से 88 प्रतिशत को हिडन चार्ज, फोर्स्ड एडऑन, सब्सक्रिप्शन के झाँसे, ड्रिप प्राईसिंग और झूठे अर्जेंसी के हथकंडों की वजह से हर माह 78 रुपये से 87 रुपये का नुकसान होता है। इन तरीकों के कारण सीधा वित्तीय नुकसान तो होता ही है, साथ में ग्राहकों का विश्वास भी कम होता है।
इसकी वजह से 55,000 करोड़ के जीएमवी पर खतरा मंडरा रहा है क्योंकि शॉपर्स खर्च को कम कर रहे हैं, कीमतों की तुलना ज्यादा सतर्कता से कर रहे हैं और दूसरे प्लेटफॉर्म पर जा रहे हैं। इस रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि 63 प्रतिशत ऑनलाईन पेमेंट यूज़र्स को डिजिटल लेन-देन के दौरान हिडन चार्ज और ड्रिप प्राईसिंग का सामना करना पड़ा। यह संख्या 2024 में दर्ज 52 प्रतिशत के मुकाबले काफी अधिक है।
सर्वे के मुताबिक मौजूदा रैगुलेटरी उपाय डिजिटल लेनदेन के भ्रामक तरीकों को रोकने में बहुम कम सफल हुए हैं। ये भ्रामक तरीके ई-कॉमर्स, बैंकिंग, ट्रैवल, राईड-हेलिंग, इंश्योरेंस, ऑनलाईन पेमेंट और डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म्स पर लाखों ग्राहकों को प्रभावित करते हैं। रिपोर्ट में यह भी उजागर हुआ कि डार्क पैटर्न भारत के डिजिटल ईकोसिस्टम की एक प्रणालीगत समस्या बन गए हैं। सर्वे के मुताबिक 73 प्रतिशत प्लेटफॉर्म फोर्स्ड एक्शन प्रक्रिया की मदद से यूज़र्स को वो करने को मजबूर करते हैं, जो वो इसके बिना नहीं करते। वहीं 69 प्रतिशत ड्रिप प्राईसिंग के हथकंडे इस्तेमाल करते हैं और चेकआउट के अंतिम चरण में जाने के बाद अतिरिक्त फीस जोड़ देते हैं।
सर्वे में शामिल आधे से अधिक प्लेटफॉर्म्स बेट-एंड-स्विच टैक्टिक का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें दिखाए गए ऑफर अंतिम प्रोडक्ट, मूल्य या ग्राहकों को दी जाने वाली सर्विस से अलग होते हैं।






