जिस मंडी के नाम में बसा है बाबूजी का नाम, वहीं जयंती पर तस्वीर पर नहीं चढ़ी फूलमाला


 एवीएस न्यूज.भोपाल 
श्रद्धेय बाबूजी पंडित स्व. लक्ष्मी नारायण शर्मा की 93वीं जयंती शनिवार को थी। राजधानी के करोंद स्थित भोपाल मंडी, जिसका नाम स्वयं पंडित लक्ष्मी नारायण शर्मा के नाम पर रखा गया है, में उनकी जयंती पर उनकी तस्वीर पर एक फूलमाला तक नहीं चढ़ाई गई। जयंती के अवसर पर इस तरह श्रद्धांजलि नहीं दिए जाने को लेकर उनके समर्थकों और उन्हें जानने वालों में निराशा का भाव रहा।


समर्थकों के अनुसार, भोपाल मंडी का नाम पंडित लक्ष्मी नारायण शर्मा के नाम पर होना महज औपचारिकता नहीं है। मंडी की स्थापना के लिए उन्होंने अथक प्रयास किए थे। उनके प्रयासों और योगदान को देखते हुए मध्यप्रदेश शासन की अनुशंसा पर मंडी बोर्ड प्रशासन ने भोपाल मंडी का नाम उनके नाम पर रखा था। ऐसे में जिस संस्थान के नाम से उनकी स्मृति आज भी जुड़ी है, वहीं उनकी जयंती पर उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण नहीं होना उनके समर्थकों को खला।

 


 स्वयंसेवक से सांसद तक रहा लंबा सार्वजनिक जीवन
पंडित लक्ष्मी नारायण शर्मा का सार्वजनिक जीवन बहुआयामी रहा। उन्होंने स्वयंसेवक, शिक्षक, पंचायत सचिव, सहकारी बैंक संचालक, विधायक, मंत्री और सांसद सहित विभिन्न भूमिकाओं में रहते हुए समाज और जनसेवा के क्षेत्र में कार्य किया। समाजसेवी के रूप में भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। उन्हें करीब से जानने वाले लोग उनके नैतिक बल, न्यायप्रियता और आत्मबल को उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताओं के रूप में याद करते हैं। सार्वजनिक जीवन में विभिन्न जिम्मेदारियां निभाने के बावजूद उनकी पहचान पद से अधिक उनके कार्य और सिद्धांतों से बनी।
 

समर्थकों ने बताया दुर्भाग्यपूर्ण
भोपाल मंडी में जयंती के दिन उनकी तस्वीर पर माल्यार्पण नहीं किए जाने को उनके चाहने वालों ने दुर्भाग्यपूर्ण और पीड़ादायक बताया। समर्थकों का कहना है कि किसी सार्वजनिक संस्थान का नाम जिस व्यक्ति की स्मृति में रखा गया हो, वहां उनकी जयंती या पुण्यतिथि पर उन्हें याद करना और श्रद्धांजलि देना उस विरासत के प्रति सम्मान का प्रतीक है।

उनके समर्थकों के लिए मंडी परिसर में लगी उनकी तस्वीर महज एक तस्वीर नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की स्मृति है, जिसने सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी, नैतिकता, न्यायप्रियता और सेवा को महत्व दिया। ऐसे में 93वीं जयंती पर मंडी परिसर में उनकी तस्वीर पर एक फूलमाला तक नहीं चढ़ाए जाने की घटना ने उनके समर्थकों को पुराने योगदान और आज की स्थिति के बीच का अंतर महसूस कराया।