एसबीआई म्यूचुअल फंड की निवेशक शिक्षा एवं जागरूकता पहल: एसेट एलोकेशन पहले से ज्यादा जरूरी, बाजार की अनिश्चितताओं में संतुलित निवेश का बन रहा आधार
एवीएस न्यूज. नई दिल्ली
ज्यादातर निवेशक उसी जगह पैसा लगाना पसंद करते हैं जहां हाल में सबसे अच्छा रिटर्न मिला हो, जैसे बाजार में तेजी के दौरान शेयरों में निवेश करना या अनिश्चितता के समय सोना खरीदना। यह तरीका भले ही सही लगे, लेकिन इतिहास बताता है कि अलग-अलग समय में अलग-अलग परिसंपत्ति वर्ग अच्छा प्रदर्शन करते हैं। जो आज काम कर रहा है, जरूरी नहीं कि कल भी वही सबसे बेहतर हो। यहीं पर एसेट एलोकेशन यानी निवेश को अलग-अलग जगह बांटने की अहमियत सामने आती है।
पिछले तीन दशकों में निवेशकों ने कई बड़े बाजार उतार-चढ़ाव देखे हैं, जैसे डॉट-कॉम बूम, 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट, कोविड-19 महामारी, बढ़ती महंगाई और दुनियाभर की राजनीतिक अनिश्चितताएं।
इन सभी दौर में एक बात साफ तौर पर सामने आई है कि अलग-अलग हालात में अलग-अलग परिसंपत्ति वर्ग बेहतर रहते हैं।
• आर्थिक तरक्की के दौर में इक्विटी अच्छा रिटर्न देने की क्षमता रखती है।
• बाजार में उथल-पुथल या तनाव के समय सोना अपेक्षाकृत मजबूत रह सकता है।
• फिक्स्ड इनकम यानी डेट आधारित निवेश आमतौर पर कम उतार-चढ़ाव वाले होते हैं और अनिश्चितता के दौर में निवेशकों को एक हद तक स्थिरता दे सकते हैं।
इसलिए कोई एक परिसंपत्ति वर्ग ऐसा नहीं है जो हर साल सबसे अच्छा रिटर्न दे। यही वजह है कि निवेश को अलग-अलग जगह बांटना जरूरी हो जाता है। सिर्फ एक ही जगह निवेश रखने से निवेशक कई मौकों से चूक सकते हैं और खराब प्रदर्शन वाले दौर का सामना करना पड़ सकता है।
बाजार चक्र विविधता को अहमियत देते हैं, एकाग्रता को नहीं
शेयर बाजार यानी इक्विटी को लंबे समय में संपत्ति बनाने का एक अच्छा जरिया माना जाता है, लेकिन कम समय में इसमें काफी उतार-चढ़ाव हो सकता है। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट और 2020 में कोविड-19 की शुरुआत में शेयर बाजारों में जबरदस्त गिरावट आई थी, हालांकि बाद में उनमें सुधार भी हुआ। उस दौरान सोने ने अपेक्षाकृत अच्छा प्रदर्शन किया और निवेशकों के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम किया, जबकि डेट आधारित निवेशों ने स्थिरता बनाए रखी।
साथ ही, सालों से औसतन 6 से 7 फीसद के आसपास बनी महंगाई ने पारंपरिक बचत साधनों से मिलने वाले वास्तविक फायदे को भी कम किया है। इससे साफ होता है कि हर हालात में कोई एक निवेश विकल्प सबसे बेहतर नहीं होता। इसलिए निवेश को अलग-अलग जगह बांटने से जोखिम कम होता है और बेहतर संतुलन बना रहता है। (स्रोत: एनएसई इंडाइसेज, निफ्टी 500 टोटल रिटर्न डेटा; आरबीआई की 'हैंडबुक ऑफ स्टैटिस्टिक्स ऑन इंडियन इकोनॉमी' तथा एमओएसपीआई सीपीआई)
कोविड-19 ने विविधीकरण की जरूरत और साबित की
2020 की घटनाएं एसेट एलोकेशन की अहमियत की एक जीती-जागती मिसाल हैं। महामारी की शुरुआत में दुनियाभर के शेयर बाजारों में इतिहास की सबसे तेज गिरावटों में से एक देखी गई। जिन निवेशकों का पोर्टफोलियो पूरी तरह इक्विटी पर टिका था, उन्हें भारी नुकसान और उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ा। सोना उस दौर में अपेक्षाकृत मजबूत बना रहा और अनिश्चितता का फायदा उठाया, जबकि चांदी में भी अच्छी तेजी देखी गई। दूसरी तरफ, फिक्स्ड इनकम निवेशों ने उस दौर में अपेक्षाकृत स्थिरता दी।
इसके बाद 2021 में जब बाजार संभले तो इक्विटी ने जोरदार वापसी की, लेकिन सोना उसी रफ्तार से आगे नहीं बढ़ पाया। इससे एक बार फिर साफ हुआ कि समय के साथ परिसंपत्ति वर्गों का प्रदर्शन बदलता रहता है। अलग-अलग परिसंपत्तियों में निवेश रखने वाले पोर्टफोलियो आमतौर पर मुश्किल हालात से बेहतर तरीके से निपट पाते हैं और निवेशकों को बाजार के हर दौर में निवेशित बने रहने में मदद करते हैं। (स्रोत: वर्ल्ड बैंक, ब्लूमबर्ग, एनएसई सूचकांक)
एसेट एलोकेशन निवेशकों को भावनाओं में बहने से भी बचा सकता है
निवेश की सबसे बड़ी चुनौती कई बार बाजार नहीं, बल्कि निवेशक का अपना व्यवहार होता है। अक्सर लोग बाजार चढ़ने के बाद निवेश बढ़ाते हैं और गिरावट आने पर पैसा निकाल लेते हैं। ऐसी प्रतिक्रियाएं लंबे समय के निवेश पर बुरा असर डाल सकती हैं। एसेट एलोकेशन निवेश में अनुशासन लाता है। यह अंदाजा लगाने की बजाय कि अगला बेहतर प्रदर्शन कौन-सा परिसंपत्ति वर्ग करेगा, निवेशकों को अलग-अलग परिसंपत्तियों में संतुलित निवेश बनाए रखने में मदद करता है। इससे बाजार के हर उतार-चढ़ाव पर बार-बार फैसला लेने की जरूरत कम हो जाती है।
आसान भाषा में कहें तो एसेट एलोकेशन का मतलब है निवेश को इक्विटी, डेट और सोने जैसी अलग-अलग जगहों में बांटना, ताकि बढ़त, स्थिरता और जोखिम के बीच सही संतुलन बना रहे। व्यावहारिक तौर पर निवेशक पहले अपने वित्तीय लक्ष्य तय कर सकते हैं, छोटी और लंबी जरूरतों को अलग कर सकते हैं और फिर अपनी जोखिम क्षमता के हिसाब से सही निवेश मिश्रण चुन सकते हैं। जैसे लंबे समय के लक्ष्यों के लिए इक्विटी में ज्यादा निवेश सही हो सकता है, जबकि कम समय की जरूरतों के लिए डेट ज्यादा स्थिरता दे सकता है। साथ ही, समय-समय पर पोर्टफोलियो की समीक्षा करना और यह देखना कि वह अपने लक्ष्यों के अनुरूप है या नहीं, भी उतना ही जरूरी है।
सबसे बड़ी सीख
दशकों के बाजार अनुभव से यह साफ होता है कि यह लगातार भांपना बेहद मुश्किल है कि कौन-सा परिसंपत्ति वर्ग सबसे अच्छा करेगा। छोटे समय के प्रदर्शन के पीछे भागने के बजाय निवेशकों के लिए अपने वित्तीय लक्ष्यों के हिसाब से एक विविध पोर्टफोलियो बनाना ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। हालांकि एसेट एलोकेशन हर साल सबसे ऊंचा रिटर्न देने की गारंटी नहीं देता, लेकिन जोखिम संभालने, बाजार के उतार-चढ़ाव से निपटने और लंबे समय में संपत्ति बनाने में इसकी बड़ी भूमिका होती है। आखिरकार, सफल निवेश का मतलब किसी एक वक्त पर सबसे अच्छी परिसंपत्ति चुनना नहीं है, बल्कि ऐसा संतुलित पोर्टफोलियो बनाना है जो बाजार की अनिश्चितताओं के बीच भी निवेशक को उसके लक्ष्यों की तरफ बढ़ने में मदद करे।
एसबीआई म्यूचुअल फंड की निवेशक शिक्षा एवं जागरूकता पहल
निवेशकों को केवल सेबी में पंजीकृत म्यूचुअल फंडों में ही निवेश करना चाहिए। पंजीकृत म्यूचुअल फंडों की जानकारी सेबी की वेबसाइट www.sebi.gov.in पर 'इंटरमीडिएरीज/मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर इंस्टीट्यूशंस' के अंतर्गत मिल सकती है। केवाईसी प्रक्रिया पूरी करने तथा पता, मोबाइल नंबर, बैंक खाते की जानकारी आदि में बदलाव के लिए निवेशक संबंधित म्यूचुअल फंड की वेबसाइट देख सकते हैं। अगर किसी पंजीकृत बिचौलिए के जवाब से निवेशक संतुष्ट न हों तो वे सेबी के स्कोर्स पोर्टल (https://scores.sebi.gov.in) पर अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। यह मंच निवेशकों को ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने और उसकी स्थिति जानने की सुविधा देता है।
म्यूचुअल फंड में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। निवेश करने से पहले योजना से जुड़े सभी दस्तावेज ध्यान से पढ़ें।






