भोपाल। मध्यप्रदेश और देश की दवा निर्माण व्यवस्था की रीढ़ कही जाने वाली छोटी और मझोली दवा निर्माता इकाइयां (फार्मा एमएसएमई) आज अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट का सामना कर रही हैं। केंद्र सरकार की कठोर नीतियों और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (सीडीएससीओ) की हालिया सख्त कार्रवाइयों ने इन इकाइयों को बंदी की स्थिति तक पहुंचा दिया है।  इसी को लेकर ज्वॉइंट फोरम ऑफ फार्मास्यूटिकल एमएसएमई ने केंद्रीय स्वास्थ्य एवं रसायन-उर्वरक मंत्री जे.पी. नड्डा को विस्तृत ज्ञापन भेजकर तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।


उक्त जानकारी फेडरेशन ऑफ मध्यप्रदेश चेंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री के कार्यालय में हुई फार्मास्यूटिकल कंपनियों की समस्याओं एवं चुनौती मुद्दें की बैठक में दी गई। बैठक की अध्यक्षता फेडरेशन के अध्यक्ष दीपक शर्मा ने की। इस बैठक में हिन्द फार्मा से डॉ. आरएस गोस्वामी, इंदौर से फेडरेशन ऑफ फार्मा इंटरप्रेन्योर्स से अमित चावला, एमएल जैन, प्रशांत सिंह एवं अभिजीत मोतीवाला के अलावा हिमांशु शाह चेयरमैन फेडरेशन ऑफ फार्मा एंटरप्रेन्योर्स मध्यप्रदेश चैप्टर, एमएल जैन वाईस चेयरमैन फेडरेशन ऑफ फार्मा एंटरप्रेन्योर्स मध्यप्रदेश, सुधीर वोरा, डॉ सुभाष रिजवानी सचिव फेडरेशन ऑफ फार्मा एंटरप्रेन्योर्स मौजूद रहे हैं। 


 फोरम ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने राहत नहीं दी तो आने वाले महीनों में लगभग चार से पांच हजार इकाइयां बंद होने की नौबत में पहुंच जाएंगी, जिससे न केवल किफ़ायती दवाओं का उत्पादन ठप होगा बल्कि भारत का "दुनिया की फार्मेसी" के रूप में मिला गौरव भी संकट में पड़ सकता है। 
- नीतियां बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े उ‌द्योगों के हित में और छोटे निर्माताओं के खिलाफ में 
प्रतिनिधियों ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सरकार ने बीते वर्षों में जीएसटी सुधार और अन्य योजनाओं से उ‌द्योग को आत्मविश्वास दिया और छोटे निर्माताओं ने गुणवत्ता सुधार में निवेश भी किया, लेकिन अब सीडीएससीओ की नीतियां बहुराष्ट्रीय कंपनियों और बड़े उ‌द्योगों के हित में और छोटे निर्माताओं के खिलाफ काम कर रही हैं। ज्ञापन में कहा गया है कि रोज़ाना जारी हो रहे नए सर्कुलरों ने व्यापार सुगमता की अवधारणा को ध्वस्त कर दिया है और उ‌द्योग का भविष्य अधर में लटका दिया है।


- छोटे उ‌द्योगों के लिए मौत का फरमान 
एक और बड़ा संकट बायो-इक्विवेर्लेस अध्ययन को लेकर है, जिसे दशकों से प्रमाणित दवाओं पर भी अनिवार्य कर दिया गया है और जिसकी लागत प्रति दवा 25 से 50 लाख रुपए है, जो छोटे उ‌द्योगों के लिए मौत का फरमान है। इससे जन औषधि केंद्रों और सरकारी आपूर्ति व्यवस्थाओं में दवा संकट खड़ा हो जाएगा। इसी तरह एनडीसीटी नियम 2019 के अंतर्गत पहले से स्वीकृत दवाओं को न्यू ड्रग मानकर लाइसेंस वापस लेने की प्रक्रिया भी उ‌द्योग के लिए घातक है।अमित चावला ने बताया कि ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि निर्यात एनओसी को केवल नशीली और लत पैदा करने वाली दवाओं तक सीमित किया जाए। 


-  50 करोड़ से कम टर्नओवर वाली इकाइयों को 1 अप्रैल 2027 तक मोहलत दी जाए
डॉ.गोस्वामी ने बताया कि सबसे गंभीर समस्या 1 जनवरी 2026 से लागू होने वाले रीवाइज्ड शेड्यूल-एम मानकों को लेकर है, जिनका पालन भारी निवेश किए बिना संभव नहीं है और मौजूदा कर्ज बोझ में डूबी इकाइयां इसे वहन नहीं कर सकतीं, इसलिए मांग की गई है कि 50 करोड़ रुपए से कम वार्षिक टर्नओवर वाली इकाइयों को कम से कम 1 अप्रैल 2027 तक मोहलत दी जाए। फोरम ने यह भी आरोप लगाया है कि रिस्क बेस्ड इंस्पेक्शन में भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है, जहां छोटे उ‌द्योगों को सिलेक्टिव तरीके से निशाना बनाया जाता है जबकि बड़ी कंपनियों की ओर से अमेरिका और अन्य देशों में हर महीने दवाओं की रिकॉल रिपोर्ट आने के बावजूद उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं होती।