डिज़ाइन सामर्थ्य और गुणवत्ता ईसीएमएस विज़न को आगे बढ़ाने के लिए अहम : अशोक चांडक
एवीएस न्यूज.भोपाल
ईसीएमएस स्कीम की सफलता दर्शाती है कि भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में इरादे से अमल की ओर एक निर्णायक परिवर्तन आया है। लिथियम-आयन सैल और फ्लेक्सिबल पीसीबी से लेकर कनेक्टर और डिस्प्ले मॉड्यूल तक मंजूरियां 16 प्रोडक्ट सैगमेंटों में हैं, और ये 8 राज्यों में फैले हुए हैं, जिसमें कर्नाटक और महाराष्ट्र प्रोजेक्ट की तदाद में सबसे आगे हैं।
इन निवेशों से 14,000 से ज्यादा नौकरियां पैदा होने और 84,515 करोड़ रुपये का उत्पादन होने की उम्मीद है, जो इस स्कीम के तहत बन रहे मज़बूत मोमेंटम को दिखाता है।
अशोक चांडक, प्रेसिडेंट, आईईएसए के अनुसार मोटे तौर पर, ईसीएमएस प्रोग्राम में 12 राज्यों से 23 उत्पाद श्रेणियों में 75 आवेदन आए हैं, जो पूरे देश में इंडस्ट्री की मज़बूत भागीदारी को दिखाता है। रु. 59,350 करोड़ के लक्षित निवेश के मुकाबले, मंज़ूरी पहले ही रु. 61,671 करोड़ तक पहुंच चुकी है, जो नीतिगत ढांचे में इंडस्ट्री के मज़बूत भरोसे को दिखाता है।
इस स्कीम से रु. 4,51,858 करोड़ से ज्यादा का उत्पादन होने की उम्मीद है, जो रु. 4,56,500 करोड़ के सकल लक्ष्य के करीब है, जबकि रोज़गार का सृजन पहले ही अनुमानित 91,600 नौकरियों के मुकाबले 65,000 से ज्यादा नौकरियां दे चुका है।
आईईएसए, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय को उसके अग्रसक्रिय दृष्टिकोण और फास्ट-ट्रैक अप्रूवल के लिए बधाई देता है, जिससे ईकोसिस्टम डैवलपमेंट में काफी तेज़ी आई है। जैसे-जैसे 2026 आकार लेने लगा है, भारत ने एक भरोसेमंद, निवेश योग्य ईएसडीएम डेस्टिनेशन के तौर पर दुनिया का भरोसा जीता है।
ईसीएमएस एक गेम-चेंजर है क्योंकि एक मज़बूत ईकोसिस्टम के लिए सिर्फ सेमीकंडक्टर ही नहीं, बल्कि कम्पोनेंट, मटीरियल और इलेक्ट्रॉनिक्स वैल्यू एडिशन की भी ज़रूरत होती है। सरकार का निरंतर मार्गदर्शन, खासकर डिज़ाइन कॉम्पिटेंसी और सिक्स सिग्मा क्वालिटी को मज़बूत करने पर- दीर्घ-कालिक वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता निर्मित करने हेतु समयोचित एवं महत्वपूर्ण दोनों है।
आईईएसए इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर सेक्टर में डिज़ाइन आधारित मैन्युफैक्चरिंग दृष्टिकोण को लगातार बढ़ावा दे रहा है और उसकी वकालत कर रहा है, और हमारे सदस्य भारत में डिज़ाइन, इनोवेशन और प्रोडक्ट रचना की उन्नति के लिए गहराई से प्रतिबद्ध हैं।
अगले चरण में स्केलिंग अप, मज़बूत डिज़ाइन टीम निर्माण, लोकल सोर्सिंग और विश्व स्तरीय गुणवत्ता पर फोकस होना चाहिए। ओईएम और सिस्टम कंपनियों को डिज़ाइन किए गए और मेड-इन-इंडिया कम्पोनेंट्स को सक्रियता से अपनाना चाहिए क्योंकि डिमांड क्रिएशन, सप्लाई क्रिएशन जितना ही ज़रूरी है, जबकि डिस्ट्रीब्यूटर भारतीय प्रोडक्ट्स को बिल ऑफ मटेरियल्स में ग्लोबल इंटीग्रेशन में मदद करते हैं।

