खाद्य तेल उत्पादन में की पुनर्योजी कृषि को बढ़ावा देने की पहल
भोपाल । उद्योग संघ, अनुसंधान संस्थानों, सरकारी निकायों और नागरिक समाज संगठनों ने मिलकर नेशनल एलायंस फॉर रीजेनेरेटिव वेजिटेबल ऑयल सेक्टर (नारवोस) का गठन भोपाल में किया है। कार्यक्रम में साल्वेंट एक्सट्रैक्टर्स एसोसिएशनऑफ इंडिया (एसईए ) ने अपने 800 सदस्य कंपनियों के साथ मिलकर पुनर्योजी उत्पादों की खरीद के लिए प्रतिबद्धता की घोषणा की। सॉलिडरिडाड द्वारा संचालित यह मंच पुनर्योजी कृषि को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देगा, जिससे मिट्टी का स्वास्थ्य सुधरेगा, उत्पादकता बढ़ेगी और किसान जलवायु परिवर्तन से बेहतर तरीके से निपट सकेंगे। यह पहलईयू–भारत साझेदारीके अंतर्गत शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य जलवाय, लचीली खाद्य प्रणालियों, टिकाऊ मूल्य श्रृंखला और किसान केन्द्रित नवाचारों को प्रोत्साहित करना है।
इस गठबंधन में सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया, एडब्ल्यूएल एग्री बिजनस, सोपा और भारतीय मृदा विज्ञान संस्थान जैसे प्रमुख निकाय शामिल हैं। यह पहल भारत की खाद्य तेल आयात पर निर्भरता घटाने, किसानों की आजीविका सुधारने और देश को टिकाऊ वनस्पति तेलों में वैश्विक नेतृत्व दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण है। वर्तमान में भारत अपनी लगभग 60 फीसदी खाद्य तेल आवश्यकता आयातसे पूरी करता है, जिस पर सालाना 1.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक खर्च होता है। वहीं अस्थिर कृषि पद्धतियों और मिट्टी की उर्वरता घटने से 2.7 करोड़ हेक्टेयर में तिलहन उत्पादन की स्थिरता खतरे में है
सॉल्वेंट एक्स्ट्रैक्टर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के उपाध्यक्ष अंग्शु मलिक ने कहाकिखाद्य तेल क्षेत्र की यात्रा के एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। हर वर्ष 1.5 लाख करोड़ रुपए से अधिक विदेशी तेल आयात पर खर्च करते हैं, जिससे हमारी खाद्य सुरक्षा वैश्विक बाजार की अस्थिरताओं पर निर्भर हो जाती है। इस गठबंधन के माध्यम से यदि हम साथ मिलकर कार्य करें तो भारत न केवल आत्मनिर्भर बन सकता है बल्कि टिकाऊ वनस्पति तेलों में वैश्विक नेतृत्व भी स्थापित कर सकता है।
एसईए के विशेष सलाहकार अतुल चतुर्वेदी ने बताया कि समय की मांग है कि हमें किसानों का उत्पादन तो बढ़ाना ही है साथ ही खेती को लंबे समय तक टिकाऊ बनाने और मिट्टी को उपजाऊ रखने के उपाये भी सोचने होंगे। डॉ. मनोरंजन मोहंती, निदेशक, आईआईएसएस ने कहाकि कृषि क्षेत्र में मृदा स्वास्थ्य सबसे गंभीर चिंता है। मृदा क्षरण की बढ़ती समस्या एक बड़ी चुनौती के रूप में सामने आ रही है। ऐसे में मृदा स्वास्थ्य को सुधारने और बनाए रखने पर केंद्रित पहल कृषि के सशक्त और टिकाऊ भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक है।

