आत्माराम सोनी .भोपाल
भारत की अर्थव्यवस्था में व्यापारी की भूमिका प्राचीन समय से महत्वपूर्ण रही है और आज भी वह आर्थिक व्यवस्था की अहम कड़ी बना हुआ है। व्यापार केवल वस्तुओं की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं, बल्कि उत्पादन, वितरण, रोजगार और उपभोक्ता तक सामान पहुंचाने वाली पूरी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इसके बावजूद आज यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जिस व्यापारी के माध्यम से आर्थिक गतिविधियों का बड़ा हिस्सा संचालित होता है, वही व्यापारी लगातार नियमों, अनुपालनों और जांच के दबाव में क्यों रहता है? यह बात आराध्य भूमिका कंस्ट्रक्शंस के विकास शर्मा  ने कही। 


शर्मा ने कहा कि अधिकांश व्यापारी अपनी पूंजी, मेहनत और जोखिम के बल पर कारोबार खड़ा करते हैं। व्यापार शुरू करने और उसे आगे बढ़ाने के लिए पूंजी की व्यवस्था भी उन्हें स्वयं करनी पड़ती है। कारोबार में लाभ हो या नुकसान, उसकी जिम्मेदारी भी मुख्य रूप से व्यापारी की ही होती है।

खासकर छोटे और मध्यम व्यापारी सीमित संसाधनों के बावजूद बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार उपलब्ध कराते हैं। कई कर्मचारियों को व्यापार के दौरान ही प्रशिक्षण और काम सीखने का अवसर मिलता है। निर्माता से लेकर थोक व्यापारी, वितरक, रिटेलर और उपभोक्ता तक पहुंचने वाली सप्लाई चेन में व्यापारी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। उसके साथ परिवहन, पैकिंग, सर्विस, कारीगर, मजदूर और अन्य छोटे व्यवसाय भी जुड़े होते हैं। यानी एक व्यापारी अकेला व्यापार नहीं करता, उसके साथ एक पूरा आर्थिक तंत्र और अनेक परिवारों की आजीविका जुड़ी होती है।


 अनुपालनों का बढ़ता बोझ
व्यापारी को बैंक ऋण और ब्याज के अलावा आयकर, जीएसटी , टीडीएस, टीसीएस, विभिन्न स्थानीय करों, बिजली-पानी के खर्च और अनेक सरकारी नियमों का पालन करना पड़ता है। इसके साथ विभिन्न विभागों की जांच और कानूनी प्रक्रियाओं का सामना भी करना पड़ सकता है।

कानून और कर व्यवस्था का पालन आवश्यक है, लेकिन छोटे एवं मध्यम कारोबारियों के लिए अनुपालनों की जटिलता और लगातार बढ़ती प्रशासनिक जिम्मेदारियां चिंता का विषय बनती जा रही हैं। किसी बीमारी, आर्थिक संकट, व्यापार में नुकसान या अन्य कठिन परिस्थिति के कारण यदि कोई अनुपालन समय पर पूरा नहीं हो पाता, तो ब्याज, जुर्माने और कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है । 


 परिवार से लेकर कर्मचारियों तक जिम्मेदारी
व्यापारी की जिम्मेदारी केवल अपनी दुकान या प्रतिष्ठान तक सीमित नहीं होती। उसे कर्मचारियों का वेतन, किराया, बिजली-पानी, बैंक ऋण और ब्याज, टैक्स, सरकारी शुल्क, बाजार की उधारी तथा अन्य खर्चों का प्रबंधन करना पड़ता है। इसके अलावा ग्राहकों को सेवा देना, कर्मचारियों के हितों का ध्यान रखना और बाजार में अपनी विश्वसनीयता बनाए रखना भी उसकी जिम्मेदारी होती है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यापार में होने वाले नुकसान का बड़ा जोखिम व्यापारी स्वयं उठाता है। नुकसान होने पर उसे ही दोबारा पूंजी जुटानी पड़ती है और परिवार तथा कर्मचारियों की जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं।


जरूरत है सहयोग और सरल व्यवस्था की
महंगी शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं का बढ़ता खर्च, महंगाई और कारोबारी लागत में वृद्धि के बीच छोटे और मध्यम व्यापारी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।ऐसे में आवश्यकता इस बात की है कि व्यापारी को केवल टैक्स देने वाले व्यक्ति के रूप में नहीं, बल्कि रोजगार और आर्थिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखा जाए। नियम, पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी हैं, लेकिन नियमों की प्रक्रिया सरल, व्यावहारिक और कारोबार के आकार के अनुरूप होना भी उतना ही जरूरी है।

व्यापारी से कानून के पालन और जवाबदेही की अपेक्षा होनी चाहिए, लेकिन उसके साथ सहयोग और सम्मान का व्यवहार भी होना चाहिए। क्योंकि व्यापारी चलता है तो बाजार चलता है, बाजार चलता है तो रोजगार चलता है, और रोजगार चलता है तो अर्थव्यवस्था आगे बढ़ती है। इसलिए व्यापारी को अभिशाप नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था के साझेदार और विकास की महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखने की जरूरत है।