ई-20 पेट्रोल पर ट्रांसपोर्ट उद्योग ने उठाए सवाल - बोले - माइलेज में कमी और इंजन से जुड़ी परेशानियों की है शिकायतें
एवीएस न्यूज. भोपाल
पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (ई-20) को लेकर ट्रांसपोर्ट उद्योग ने अपनी चिंताएं सामने रखी हैं। परिवहन क्षेत्र से जुड़े लोगों का कहना है कि ई-20 ईंधन के इस्तेमाल से वाहनों की माइलेज, इंजन की क्षमता और रखरखाव लागत पर पड़ने वाले प्रभावों का विस्तृत मूल्यांकन किया जाना चाहिए। ट्रांसपोर्ट कारोबारियों के अनुसार, लंबे समय तक चलने वाले वाणिज्यिक वाहनों में ईंधन की गुणवत्ता और औसत माइलेज बेहद महत्वपूर्ण होती है।
उनका कहना है कि कुछ वाहन मालिकों ने ई-20 पेट्रोल के उपयोग के बाद माइलेज में कमी और इंजन से जुड़ी परेशानियों की शिकायतें की हैं, जिनका समाधान जरूरी है।

ऑल इंडिया मोटर एंड गुड्स ट्रांसपोर्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेंद्र कपूर ने सरकार से मांग की है कि ई-20 के व्यापक उपयोग से पहले उसके दीर्घकालिक प्रभावों पर स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन सार्वजनिक किए जाएं तथा संभावित नुकसान की स्थिति में जवाबदेही तय की जाए।
राजेन्द्र कपूर ने कहा कि सरकार ई-20 को हरित ऊर्जा, विदेशी मुद्रा की बचत और किसानों के हित में महत्वपूर्ण कदम बता रही है, लेकिन देश के लाखों छोटे और मध्यम ट्रांसपोर्टरों के सामने यह सवाल है कि यदि इस ईंधन के उपयोग से माइलेज घटता है, इंजन या फ्यूल सिस्टम पर अतिरिक्त प्रभाव पड़ता है अथवा रखरखाव का खर्च बढ़ता है, तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा।

ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (एआईएमटीसी ) राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. हरीश सबरवाल ने कहा कि वैज्ञानिक अध्ययनों में एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम मानी गई है, जिसके कारण ई-20 के उपयोग से कुछ परीक्षणों में 2 से 6 प्रतिशत तक माइलेज में कमी दर्ज की गई है। उनका कहना है कि यह कमी वाणिज्यिक वाहनों के लिए हर महीने और हर वर्ष अतिरिक्त ईंधन लागत में बदल सकती है, जिसका असर अंततः मालभाड़े, व्यापार और आम उपभोक्ता पर पड़ेगा।

आरटीओ एवं ट्रैफिक कमेटी के चेयरमैन सी.एल. मुकाती ने यह भी आशंका जताई कि ई-20 के अनुरूप डिजाइन नहीं किए गए पुराने वाहनों में फ्यूल पाइप, रबर सील, गैस्केट, फ्यूल पंप तथा अन्य ईंधन प्रणाली के पुर्जों पर अतिरिक्त प्रभाव पड़ सकता है। यदि भविष्य में ऐसी तकनीकी समस्याएं सामने आती हैं, तो वाहन निर्माता, तेल कंपनियां अथवा सरकार में से जिम्मेदार कौन होगा, इस पर अभी स्पष्ट नीति नहीं है।
एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने सरकार के सामने कई सवाल रखे हैं। इनमें प्रमुख हैं कि क्या देश में संचालित सभी वाणिज्यिक वाहन ई-20 के लिए प्रमाणित और सुरक्षित हैं, क्या 8 से 15 वर्ष पुराने वाहनों पर इसके प्रभाव को लेकर कोई सार्वजनिक वैज्ञानिक अध्ययन उपलब्ध है, और यदि भविष्य में इंजन या फ्यूल सिस्टम में खराबी आती है अथवा माइलेज कम होने से परिवहन लागत बढ़ती है तो उसकी आर्थिक जिम्मेदारी कौन उठाएगा।
राजेन्द्र कपूर ने स्पष्ट किया कि ट्रांसपोर्ट उद्योग पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छ ऊर्जा और किसानों के हितों का समर्थन करता है, लेकिन नई ईंधन नीति लागू करने से पहले वैज्ञानिक पारदर्शिता, आर्थिक सुरक्षा और जवाबदेही सुनिश्चित करना आवश्यक है। एसोसिएशन ने समाचार-पत्रों, टीवी चैनलों, डिजिटल मीडिया और जनप्रतिनिधियों से भी इस मुद्दे को गंभीरता से उठाने की अपील करते हुए कहा कि यह केवल ईंधन परिवर्तन का विषय नहीं, बल्कि करोड़ों वाहन मालिकों, लाखों ट्रांसपोर्ट व्यवसायियों और देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है।
उद्योग प्रतिनिधियों का कहना है कि एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल से प्रदूषण कम करने और कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटाने के सरकार के उद्देश्य महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इसके साथ ही वाहन मालिकों और ट्रांसपोर्ट क्षेत्र की व्यावहारिक समस्याओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।






