अमरनाथ से भी कठिन और दुर्गम मानी जाती है नागद्वारी यात्रा, 
बारिश के बीच 35 किलोमीटर के कठिन रास्ते पर आस्था का सैलाब

एवीएस  न्यूज.सोहागपुर 


पचमढ़ी की प्रसिद्ध नागद्वारी में कल नाग पंचमी के अवसर पर लाखों श्रद्धालु नाग देवता के महादर्शन करेंगे। पिछले करीब एक सप्ताह से देश के विभिन्न हिस्सों, विशेषकर महाराष्ट्र से बड़ी संख्या में शिवभक्त नागद्वारी मेले में पहुंच रहे हैं। नाग पंचमी का दिन श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व रखता है और इस दिन दुर्गम पहाड़ी रास्तों से होकर नागद्वारी पहुंचने वाले श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है।


नागद्वारी की यात्रा को श्रद्धालु बेहद कठिन और दुर्गम मानते हैं। करीब 35 किलोमीटर के पहाड़ी मार्ग में कई स्थानों पर सीधी खड़ी चट्टानों, कठिन चढ़ाइयों, नदी-नालों और फिसलन भरे रास्तों से होकर गुजरना पड़ता है। कई जगह लोहे की सीढ़ियों और रस्सियों का सहारा लेकर श्रद्धालु आगे बढ़ते हैं। लगातार बारिश के बीच पग-पग पर चुनौती के बावजूद आस्था के आगे कठिनाइयां बौनी साबित होती दिखाई देती हैं।


 

पग-पग पर चुनौती, कदम-कदम पर आस्था
नागद्वारी यात्रा की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें छोटे बच्चों से लेकर बुजुर्ग महिला-पुरुष तक शामिल होते हैं। बारिश, फिसलन, दुर्गम चट्टानों और नदी-नालों की बाधाओं को पार करते हुए श्रद्धालु नागद्वारी पहुंचते हैं। यात्रा के दौरान कई स्थानों पर रास्ते बेहद संकरे और कठिन हैं। इसके बावजूद श्रद्धालुओं के कदम रुकते नहीं। कोई भगवान शिव का नाम जपते हुए आगे बढ़ता है तो कोई नाग देवता के दर्शन की मनोकामना लेकर कठिन चढ़ाई पूरी करता है। यही आस्था नागद्वारी यात्रा को विशिष्ट बनाती है।
 

नागद्वारी से जुड़ी हैं कई किंवदंतियां
नागद्वारी मेले और यहां होने वाले नाग देवता के दर्शनों को लेकर अनेक धार्मिक मान्यताएं और किंवदंतियां प्रचलित हैं। मान्यता है कि यहां से नागलोक जाने का मार्ग है। एक अन्य कथा के अनुसार भस्मासुर से बचने के लिए भगवान शिव ने जब पचमढ़ी में शरण ली थी, तब उन्होंने अपना नाग यहां छोड़ दिया था।

इसी तरह संतान प्राप्ति से जुड़ी एक लोककथा भी नागद्वारी से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि एक महिला ने संतान प्राप्ति के लिए नाग देवता से मन्नत मांगी थी और मनोकामना पूर्ण होने पर उनकी आंखों में काजल लगाने का प्रण लिया था। संतान प्राप्ति के बाद वह अपना प्रण पूरा नहीं कर सकी, जिसके चलते उसके पुत्र की मृत्यु हो गई। दुखी होकर उसने अपना प्रण पूरा किया और उसे पुन: पुत्र की प्राप्ति हुई।

किंवदंतियां और मान्यताएं भले ही अलग-अलग हों, लेकिन नागद्वारी के प्रति श्रद्धालुओं की आस्था सदियों से अटूट बनी हुई है।

 

 

महाराष्ट्र से बड़ी संख्या में पहुंचते हैं शिवभक्त

पचमढ़ी के महादेव और नागद्वारी के प्रति महाराष्ट्र के शिवभक्तों में विशेष आस्था है। नाग पंचमी के अवसर पर महाराष्ट्र सहित विभिन्न क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। कई परिवार और सेवा मंडल वर्षों से इस यात्रा का हिस्सा बनते आ रहे हैं।

नाग पंचमी के बाद श्रद्धालुओं की वापसी शुरू हो जाएगी। इसके साथ ही नागद्वारी मेले की रौनक भी धीरे-धीरे कम होने लगेगी।

प्रशासन के साथ सेवा मंडलों की महत्वपूर्ण भूमिका

लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए नर्मदापुरम जिला प्रशासन और मेला समिति द्वारा व्यवस्थाएं की जाती हैं। इसके साथ ही विभिन्न स्थानों पर श्रद्धालुओं के साथ पहुंचे सेवा मंडल भी भोजन, पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

दुर्गम क्षेत्र होने के कारण यहां सरकारी व्यवस्थाओं के साथ स्वयंसेवी सेवा मंडलों की भूमिका भी श्रद्धालुओं के लिए काफी महत्वपूर्ण हो जाती है।

नागद्वारी मेला स्थानीय कारोबार के लिए भी बड़ा अवसर

नागद्वारी मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ पचमढ़ी के स्थानीय कारोबार के लिए भी महत्वपूर्ण अवसर लेकर आता है। लाखों श्रद्धालुओं के पहुंचने से होटल, मोटल, रिसॉर्ट, भोजनालय, परिवहन और छोटे-बड़े दुकानदारों का कारोबार बढ़ता है।

स्थानीय व्यापारियों के साथ बाहर से आने वाले व्यापारी भी मनिहारी, पूजन सामग्री, खान-पान और अन्य बिक्री योग्य सामान लेकर मेले में पहुंचते हैं। महादेव और नागद्वारी मेले की प्रतीक्षा होटल संचालकों से लेकर छोटे दुकानदारों तक सभी को रहती है।

कुल मिलाकर नागद्वारी की यात्रा जितनी कठिन और दुर्गम है, श्रद्धालुओं की आस्था उतनी ही मजबूत है। लगातार बारिश, पहाड़ी चट्टानों और कठिन रास्तों के बीच लाखों कदम नाग देवता के दर्शन के लिए बढ़ रहे हैं। नाग पंचमी पर यह दुर्गम पहाड़ श्रद्धा, विश्वास और भक्ति के विशाल संगम का साक्षी बनेगा