नौकरीपेशा महिलाएं नौकरीपेशा पुरुषों से आगे - स्कोर 62.0 बनाम 60.2।


एवीएस न्यूज. मुंबई  

पहले इंडिया फाउंडेशन ने अमेज़न पे के साथ मिलकर आज डिजिटल क्रेडिट एंड इंक्लूजन इंडेक्स (डीसीआईआई) 2026 जारी किया। यह भारत का पहला ऐसा संयुक्त मानक है, जो देश के डिजिटल क्रेडिट के सफर की पूरी तस्वीर दिखाता है। यह अध्ययन 20 राज्यों के 100 शहरों में 5,000 से ज्यादा लोगों से सीधे
बातचीत पर आधारित है। अब तक के मानक ज्यादातर यही देखते आए हैं कि डिजिटल भुगतान कितना अपनाया गया या कुल कर्ज कितना बंटा। डीसीआईआई इससे आगे जाकर देखता है कि डिजिटल क्रेडिट तक पहुंच किसकी है, लोग उसे कितनी आसानी से और कितनी बार इस्तेमाल करते हैं, उधार क्यों लेते हैं, उस पर भरोसा करते हैं या नहीं, और उसके इस्तेमाल से उनकी वित्तीय स्थिति सचमुच बेहतर होती है या नहीं। भारत के वित्तीय समावेशन की तस्वीर में यह एक बड़ी कमी को भरता है।


पहले इंडिया फाउंडेशन के चेयरमैन राजीव कुमार ने कहा, 'वित्तीय समावेशन को सिर्फ पहुंच और इस्तेमाल से नहीं, नतीजों से नापा जाना चाहिए। डीसीआईआई यही देखता है कि अलग-अलग शहरों, लिंग और आय वर्गों में डिजिटल क्रेडिट से वित्तीय मजबूती बढ़ रही है या नहीं। यह इंडेक्स अमेज़न पे के साथ मिलकर बनाया गया है और हर साल इसे ट्रैक किया जाएगा। हमें उम्मीद है कि इससे नीति बनाने वालों और वित्तीय संस्थानों को कमियां पहचानने में मदद मिलेगी, और वे अपनी कोशिशें वहां लगा सकेंगे जहां उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है।'


अमेज़न पे इंडिया के सीईओ विकास बंसल ने कहा,' भारत के बेहतरीन डिजिटल भुगतान ढांचे ने करोड़ों लोगों के लेनदेन का तरीका बदल दिया है। अगला कदम यह है कि डिजिटल क्रेडिट भी उतना ही सुलभ, भरोसेमंद और काम का बने। टियर-2 शहरों का डिजिटल क्रेडिट में आगे निकलना बताता है कि अगली बड़ी बढ़त कहां से आ सकती है। हमारे 75% ग्राहक टियर-2 और टियर-3 शहरों में हैं, इसलिए डीसीआईआई से मिली समझ हमें इन बाजारों के लिए ज्यादा काम के क्रेडिट और बचत के अनुभव बनाने में मदद करेगी। साथ ही टियर-1 शहरों में जो अवसर अब तक अछूते हैं, उन पर भी काम होगा। भारत विकसित भारत 2047 की तरफ बढ़ रहा है, और डीसीआईआई यह देखने में मदद करेगा कि डिजिटल क्रेडिट असल वित्तीय तरक्की में कैसे बदलता है।'

मुख्य निष्कर्ष
भारत की डिजिटल क्रेडिट की कहानी टियर-2 के कर्जदार लिख रहे हैं

डीसीआईआई दिखाता है कि डिजिटल उधारी का भूगोल बदल रहा है। उम्र, लिंग, आय, पेशा और शिक्षा, हर पैमाने पर डिजिटल क्रेडिट अपनाने में टियर-2 शहर सबसे आगे हैं। उनका औसत स्कोर 58.64 है, जबकि टियर-1 का 53.1 और टियर-3 का 55.7 है। भारत के डिजिटल भुगतान और डिजिटल क्रेडिट के सफर में यह एक अहम फर्क है। डिजिटल भुगतान में टियर-1 शहर अब भी आगे हैं, पर डिजिटल क्रेडिट अपनाने के सबसे मजबूत केंद्र टियर-2 शहर बनकर उभर रहे हैं। इस बढ़त में कोयंबटूर, सूरत, नागपुर, इंदौर, प्रयागराज, रांची, गाजियाबाद और लुधियाना जैसे शहर आगे हैं। लैंगिक अंतर भी टियर-2 शहरों में सबसे कम है: 2.8 अंक,जबकि टियर-1 शहरों में यह 9.1 अंक है। इससे लगता है कि जहां अपनाना ज्यादा है, वहां भागीदारी भी ज्यादा संतुलित है।

आर्थिक मौके भारत में डिजिटल क्रेडिट का लैंगिक अंतर घटा रहे हैं  ।  महिलाओं के वित्तीय समावेशन में आर्थिक स्वायत्तता बड़ी भूमिका निभाती है। कुल मिलाकर डिजिटल क्रेडिट में पुरुषों का स्कोर ज्यादा है, पर नौकरीपेशा लोगों में यह अंतर उलट जाता है। नौकरीपेशा महिलाओं का डीसीआईआई स्कोर 62.0 है, जबकि नौकरीपेशा पुरुषों का 60.2। पीढ़ियों के हिसाब से भी यह अंतर घट रहा है। 18-29 साल के लोगों में लैंगिक अंतर 2.9 अंक रह जाता है, जबकि 60 साल और उससे ऊपर के लोगों में यह 4.6 अंक है। निष्कर्ष बताते हैं कि बराबरी का आर्थिक मौका, खासकर नियमित नौकरी, यह अंतर पाटने में मदद कर सकता है, और उसे उलट भी सकता है।भारत डिजिटल क्रेडिट को जानता है। अगली चुनौती भरोसे और असर की है  । 

जानकारी अब सबसे बड़ी अड़चन नहीं रही: 94.4% लोग डिजिटल क्रेडिट के कम से कम एक रूप के बारे में जानते हैं। पर भरोसा अब भी चुनौती है। डिजिटल उधारी पर भरोसा 52.5 पर है, जबकि डिजिटल भुगतान पर 69.7 पर। यह 17 अंक का फासला बताता है कि उधार लेने के अनुभव में भरोसा, पारदर्शिता और सादगी लाने की जरूरत है। पैसे की तंगी के वक्त भी डिजिटल क्रेडिट की भूमिका सीमित दिखती है। पिछली बार जब लोगों के सामने पैसे की कमी आई, तो 48.2% ने बचत का सहारा लिया। सिर्फ 6.9% ने डिजिटल लोन ऐप का इस्तेमाल किया और 3.4% ने बाय नाउ पे लेटर (बीएनपीएल) का। डिजिटल क्रेडिट भले ही ज्यादा उपलब्ध हो
रहा हो, पर वह अभी मुश्किल वक्त का सहारा नहीं बना है। डिजिटल भागीदारी बढ़ी, पर क्रेडिट सिस्टम की नजर में सब नहीं आए ,इस रफ्तार का फायदा सबको बराबर नहीं मिल रहा।

डीसीआईआई एक ऐसी दिक्कत सामने लाता है जो ढांचे
में ही बैठी है: डिजिटल रूप से सक्रिय होने भर से कोई औपचारिक क्रेडिट सिस्टम की नजर में नहीं आ जाता। गृहिणियां, गिग वर्कर, दिहाड़ी कमाने वाले, छात्र और नियमित नौकरी से बाहर के दूसरे लोग डिजिटल क्रेडिट से जुड़ाव में नौकरीपेशा और कारोबारी लोगों से करीब 11 अंक नीचे हैं। यह खाई आय और पेशे से गहरे जुड़ी है। इससे साफ है कि आय के पारंपरिक कागजातों के साथ-साथ डिजिटल लेनदेन का रिकॉर्ड और नकदी के आने-जाने पर आधारित आकलन भी जोड़ने होंगे, खासकर स्वरोजगार करने वालों, गिग वर्कर और अनियमित आय वाले दूसरे लोगों के लिए।खपत से आगे, उत्पादक इस्तेमाल की ओर डिजिटल क्रेडिट का इस्तेमाल ज्यादातर खपत के लिए हो रहा है।

59% लोग इससे इलेक्ट्रॉनिक्स और घरेलू
उपकरण खरीदते हैं। उत्पादक इस्तेमाल, जैसे कारोबार में पैसा लगाना, संपत्ति बनाना या वित्तीय योजना में मदद लेना, अब भी कम है और इसका स्कोर 43.2 है। लेकिन बार-बार इस्तेमाल करने वालों में यह काफी ऊपर जाता है: उनमें से 64% कहते हैं कि वे डिजिटल क्रेडिट का उत्पादक इस्तेमाल करते हैं। इससे लगता है कि
जैसे-जैसे लोग डिजिटल क्रेडिट से परिचित होते हैं, वे उसे लंबी अवधि के वित्तीय लक्ष्यों के लिए ज्यादा इस्तेमाल करने लगते हैं। अगला लक्ष्य सिर्फ नए उपयोगकर्ता जोड़ना नहीं है, बल्कि मौजूदा लोगों की आदत को गहरा करना है।

डीसीआईआई बताता है कि भारत के डिजिटल वित्तीय सफर का नया दौर शुरू हो चुका है। पहुंच और ढांचा बन चुका है, अब मौका यह है कि क्रेडिट ज्यादा भरोसेमंद, सोच-समझकर लिया जाने वाला और सबके लिए बने, तथा उसे अपनाने से वित्तीय नतीजे भी मजबूत हों। रिपोर्ट सरकार, नियामकों, वित्तीय संस्थानों, फिनटेक कंपनियों और शोधकर्ताओं के लिए कुछ प्राथमिकताएं तय करती है: डिजिटल क्रेडिट का दायरा एक जैसे तरीके से नापा जाए; वैकल्पिक अंडरराइटिंग के लिए सहमति से मिले आंकड़ों का इस्तेमाल हो; अनियमित आय को ध्यान में रखकर व्यवस्था बने; पारदर्शिता और जिम्मेदार उधारी मजबूत हो; टियर-2 और टियर-3 की भागीदारी गहरी हो; और क्रेडिट तथा बचत के बीच का रिश्ता मजबूत करते हुए यह भी देखा जाए कि पहुंच से लोगों की वित्तीय मजबूती बढ़ रही है या नहीं।