-जैतवारा के बालाजी पैलेश में चल रही श्रीमद् भागवत कथा का छठवां दिन
कथा सुनने साधु-संत और राजनेता पहुंचे, लिया आशीर्वाद
भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा जाने पर गोपियों की विरह वेदना का विस्तार से किया वर्णन 


एवीएस न्यूज, भोपाल।

सतना जिले के जैतवारा के कोठी रोड स्थित बालाजी पैलेश में श्रीमद् भागवत कथा की ज्ञान गंगा बह रही है। यह कथा जैतवारा के सराफा व्यापारी संतोष सोनी के सौजन्य से आयोजित किया जा रहा है। बालाजी पैलेस में चल रही कथा श्रवण करने जैतवारा सहित आस-पास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। शुक्रवार को कथा पंडाल में कथा सुनने अयोध्या धाम से साधु-संत सहित शंकर दयाल त्रिपाठी चित्रकूट के पूर्व विधानसभा प्रत्याशी, चंद्रकमल त्रिपाठी प्रदेश कार्य समिति सदस्य भाजपा, सतना के महापौर योगेश्ा ताम्रकार सहित अन्य राजनेता भी पहुंचे। उन्होंने कथा पीठ और कथा वाचक डॉ. श्यामसुंदर महाराज का आशीर्वाद लिया। वहीं कथा वाचक डॉ. श्यामसुंदर महाराज ने सबस का अभिनंदन किया। फिर सभी ने भागवत कथा का श्रवण कर आनंद लिया।


शुक्रवार को कथा वाचक डॉ. श्यामसुंदर महाराज जी ने विभिन्न प्रसंगों के साथ गोवर्धन पूजा और इंद्र के घमंड को भगवान श्रीकृष्ण ने कैसे ध्वस्त किया कथा सुनाकर कथा का शुभारंभ किया। उन्होंने बताया कि नंदबाबा और यशोदा माता जब इंद्र की पूजा करते हैं तो भगवान श्रीकृष्ण ने कहा बाबा इंद्र की पूजा न करके गोवर्धन पर्वत की पूजा करें। क्योंकि गोवर्धन हमें गायों के लिए चारा और लकड़ियां देता है, जिससे हमारे घर में खाना बनता है। उन्होंने बाबा से बार-बार इंद्र की पूजा न करने को कहा तो इंद्र क्रोधित हो जाते हैं और नंदगांव के लोगों को सबक सिखाने के लिए मूसलाधार बारिश करते हैं। बारिश होते ही पूरे गांव में हाहाकार मच जाता है।  भगवान कृष्ण ने कहा इंद्र से डरने या घबरने की जरूरत नहीं है, गांव के सभी लोग अपने भाई-बंधुओं, सामान और पशुओं को लेकर गोवर्धन पर्वत की तरफ आओ वे ही हमारी रक्षा करेंगे। तब सभी लोग गोवर्धन पर्वत की ओर पहुंचे। बाल रूप श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली से ऊपर उठा कर माता-पिता और सभी गांव के रहवासियों को उसके नीचे शरण देकर सबकी रक्षा की। यह देख इंद्र और क्रोधित हो गया, इंद्र ने मेघों को आदेश दिया कि पूरे गांव को मूशलाधार बारिश कर पानी में डूबो दो। सात दिन तक लगातार मूशलाधार बारिश की, लेकिन किसी का कुछ अहित नहीं कर सका। गलती का भान होने पर इंद्र भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में जाकर माफी मांगी। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र के विनय पूर्वक माफी मांगने से प्रसन्न होकर उन्हें माफ कर दिया। बारिश बंद होने पर सभी गांव वाले खुशियां मनाते हुए अपने-अपने घर को लौट आए।


कृष्ण को लेने अक्रूर जी को भेजा नंदगांव
डॉ. श्यामसुंदर महाराज ने महारास ने कथा को आगे बढ़ाते हुए कई प्रसंगाें का श्रवण कराया और भजन सुनाए, जिससे सुन उपस्थित श्रद्धालु खूब झूमे। उसके बाद कंस वध की कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि भगवान कृष्ण ने कंस का वध कैसे किया। उन्होंने बताया जब नारद मुनि ने कंस को बताया कि तुम्हारा वध करने वाला नंदगांव (ब्रज) में है। यह सुन कर कंस क्रोध में आकर वसुदेव को मारने के लिए दौड़ पड़ा। नारद मुनि ने पुन: कंस को रोककर सारी बात बताई। कंस ने श्रीकृष्ण को मारने के लिए कई राक्षसों को ब्रज भेजा, लेकिन भगवान ने  सारे राक्षसों का वध कर दिया। इसके बाद उन्होंने कृष्ण को मारने के लिए उपाय बनाया कि अब कृष्ण को मथुरा लोकर ही मारूंगा। इसके लिए अक्रूर जी को बुलाया और कहा ब्रज जाकर कृष्ण को मेला देखने के बहाने मथुरा लेकर आओ। यहां उसका मैं वध करूंगा। महाराज कंस की आज्ञा के बाद अक्रूरजी ब्रज पहुंचे और कंस के सड़यंत्र की सारी बात कृष्ण को बता दी। श्रीकृष्ण ने बाबा से कहा हम चाचा अक्रूरजी के साथ मेला देखने मथुरा जाएंगे। दूसरे दिन सुबह अक्रूर जी बलदाऊ और कृष्ण को साथ लेकर मथुरा के लिए निकले पड़े। रास्ते में ब्रह की गोपियों ने उनका रास्ता रोक लिया, कहा हम कृष्ण की विरह में कैसे जिएंगे। तब अकरूर जी और कृष्ण ने गोपियों को समझाया, तब जाकर गोपियों ने मार्ग छोड़ा।  इसके बाद अक्रूरजी कृष्ण और बलदाऊ के साथ मथुरा पहुंचे। 


कोबिलया पीठ नामक हाथी से मरवाने की बनाई साजिश


दूसरे दिन सुबह सभा में जाने के लिए कृष्ण और बलदाऊ निकले तो वहां कंस ने उन्हें मारने के लिए कोबिलया पीठ नामक हाथी को द्वार पर खड़ा कर दिया था। हाथी जैसे ही कृष्ण की बढ़ा तो भगवान ने एक ही मुक्का मार कर हाथी को परलोक भेज दिया। इसके बाद वहां उपस्थित लोगों ने भगवान कृष्ण के दर्शन कर प्रमाण किया। भगवान ने सभी उनकी भावना के अनुरूप दर्शन दिए। इसके बाद बड़े-बड़े पहलवानों को बुलाया कृष्ण और बलदाऊ को मारने की साजिश बनाई और मलयुद्ध के लिए ललकारा, लेकिन कृष्ण और बलदाऊ ने सभी पहलवानों को यमलोक भेज दिया। यह देख कंस क्रोधित होकर कृष्ण को मारने के लिए उठा। भगवान श्रीकृष्ण ने तुरंत एक छलांग लगाकर कंस के सिंहासन के पास पहुंच गए और उसे पटकर कर मुस्ठिका से प्रहार किया, जिससे कंस के प्राण पखेरू उड़ गए। कंस के मरने के बाद पूरे सभा में कृष्ण की जय-जयकार होने लगी। कृष्ण ने सबसे पहले कारागार में बंद वासुदेव और माता देवकी को मुक्त कराया। इसके बाद कंस के पिता महाराज उग्रसेन को कारागार से मुक्त कराकर उन्हें राज सिंहासन पर बैठाया।  इसके बाद वहां से भगवान कृष्ण बलदाऊ के साथ शिक्षा ग्रहण करने उज्जैन चले जाते हैं। वहां शिक्षा पूर्ण कर गुरू का गुरु दक्षिण में उनके मृत पुत्र को यम लोक से वापस लोकर उनको सौंपते हैं, जिससे गुरू उनसे प्रसन्न हो जाते हैं। इसके बाद रुक्मिणी के स्वयंबर की कथा सुनाई। अंत में आरती कर प्रसाद बांटा और छठवें दिन की कथा का समापन किया। राधे-राधे...