चुनौतीपूर्ण है हाई एलडीएल कोलेस्ट्रॉल, मरीजों को सख्त नियंत्रण की आवश्यकता : डॉ. शाह
भोपाल। कार्डियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया की 2024 गाइडलाइन के अनुसार कोलेस्ट्रॉल की जांच 18 वर्ष की उम्र से ही शुरू कर देनी चाहिए। शुरुआती जांच से हाई एलडीएल का जल्दी पता चल जाता है और उसका इलाज आसान हो जाता है। एम्स भोपाल कार्डियोलॉजी, असिस्टेंट प्रोफेसर, डॉ. भूषण शाह ने कहा एलडीएल कोलेस्ट्रॉल चुनौतीपूर्ण है क्योंकि यह बिना लक्षणों के धीरे-धीरे बढ़ता है और जीवनभर बना रहता है।
मरीजों की सबसे आम गलती यह होती है कि जब उनके स्तर सामान्य हो जाते हैं या तबियत ठीक महसूस होने लगती है, तो वे दवाएं बंद कर देते हैं। वास्तव में, दवा बंद करते ही कोलेस्ट्रॉल तेजी से बढ़ जाता है। इसलिए एलडीएल-सी को लगातार नियंत्रित करना जरूरी है और एक बार शुरू हुई दवा को जीवनभर जारी रखना अनिवार्य है। दवाओं के साथ संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और तनाव प्रबंधन भी जरूरी हैं। निरंतर प्रयासों से मरीज गंभीर हृदय रोग के खतरे को काफी कम कर सकते हैं और लंबे समय तक स्वस्थ जीवन जी सकते हैं।
जांच के बाद डॉक्टर से सलाह
जांच रिपोर्ट आने के बाद कार्डियोलॉजिस्ट से मिलकर व्यक्तिगत सलाह लेना ज़रूरी है। डॉक्टर उम्र, पारिवारिक इतिहास, जीवनशैली और अन्य स्वास्थ्य स्थितियों के आधार पर हर व्यक्ति के लिए एलडीएल का लक्ष्य स्तर तय करते हैं। ध्यान रहे कि हर व्यक्ति का लक्ष्य अलग होता है। यही कारण है कि विशेषज्ञ सलाह से बनी प्रबंधन योजना अधिक प्रभावी और व्यक्तिगत ज़रूरतों के अनुसार होती है।
पिछले कुछ वर्षों में एलडीएल कोलेस्ट्रॉल के इलाज का दृष्टिकोण बदल गया है। पहले दवा केवल उन्हीं मरीजों को दी जाती थी जिनका एलडीएल स्तर बहुत अधिक होता था जैसे मधुमेह वाले मरीजों में 130 मिलीग्राम प्रति डेसिलीटर से ऊपर और अन्य मरीजों में 160 मिलीग्राम प्रति डेसिलीटर से ऊपर। कई लोग अब भी सोचते हैं कि दवा सिर्फ उच्च जोखिम वाले मरीजों के लिए ही दी जाती है, लेकिन हाल ही में ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस ने सुझाव दिया है कि कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाएँ उन लोगों को भी दी जाएँ जिनमें अगले 10 साल में हार्ट अटैक या स्ट्रोक का जोखिम 10ः से भी कम है। यह बदलाव अब वैश्विक स्तर पर अपनाया जा रहा है और इसका मतलब है कि इलाज पहले ही चरण में शुरू करना ज़रूरी हो गया है।
संतुलित थाली शरीर को अलग-अलग पोषक तत्व देती है
दिल की देखभाल छोटी-छोटी लेकिन ज़रूरी बदलावों से शुरू की जा सकती है, जैसे आहार और जीवनशैली में सुधार करना। भोजन में अधिक फल, सब्जि़याँ और साबुत अनाज शामिल करने से हृदय स्वास्थ्य बेहतर होता है। संतुलित थाली शरीर को अलग-अलग पोषक तत्व देती है। वसा युक्त भोजन खाते समय भी यदि मात्रा पर नियंत्रण रखा जाए और स्वच्छता का ध्यान रखा जाए, तो यह दिल को स्वस्थ रखने में सहायक होता है। चूँकि हर व्यक्ति की सेहत और खानपान की आदतें अलग होती हैं, इसलिए किसी स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेकर ही आहार योजना बनाना सबसे सही तरीका है। इससे आहार आपकी संपूर्ण सेहत, पसंद और सांस्कृतिक संदर्भ के अनुरूप तय किया जा सकता है।

