एक ओर चुनाव, पारदर्शिता और सक्रियता का मॉडल, दूसरी ओर राजनीतिक निर्भरता, वित्तीय अस्पष्टता और संगठनात्मक ठहराव
 

एवीएस न्यूज .भोपाल

भोपाल के व्यापारिक जगत में सक्रिय दो प्रमुख संगठनों — कॉम्पीस्ट और चेंबर ऑफ कॉमर्स — की कार्यप्रणाली को लेकर इन दिनों गंभीर चर्चा और तुलना सामने आ रही है। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर दोनों संस्थाओं की कार्यशैली, लोकतांत्रिक परंपराओं, वित्तीय पारदर्शिता और संगठनात्मक सक्रियता में स्पष्ट अंतर नजर आता है।


कॉम्पीस्ट की कार्यप्रणाली पर उठे सवाल
कॉम्पीस्ट, जिसके अध्यक्ष गोविंद गोयल हैं, की स्थापना को लगभग सात वर्ष हो चुके हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस पूरे कार्यकाल में एक भी नियमित चुनाव नहीं कराए गए। व्यापारिक संगठनों में चुनाव को लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रीढ़ माना जाता है, ऐसे में चुनावों का अभाव संस्था की आंतरिक पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।


सूत्रों के अनुसार, कॉम्पीस्ट का अस्तित्व मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार के गठन के बाद सामने आया और सत्ता परिवर्तन के साथ ही संस्था की गतिविधियां लगभग ठप हो गईं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि संगठन का स्वरूप राजनीतिक निर्भरता से जुड़ा हुआ रहा, न कि स्वतंत्र व्यापारिक मंच के रूप में विकसित हुआ।


वित्तीय स्तर पर भी कॉम्पीस्ट की स्थिति सवालों के घेरे में है। डेढ़ साल के कार्यकाल में संस्था के पास लगभग 80 लाख रुपये के फंड की जानकारी सामने आती है, लेकिन आज तक इसका कोई स्पष्ट हिसाब-किताब सार्वजनिक नहीं किया गया। सदस्यों से लगभग एक लाख रुपये की सदस्यता शुल्क वसूली गई, बावजूद इसके फंड के उपयोग और संचालन को लेकर स्थिति अस्पष्ट बनी हुई है।


सबसे गंभीर तथ्य यह है कि संस्था में कोषाध्यक्ष होने के बावजूद तेजकुल पाल सिंह पाली के किसी भी चेक पर आज तक हस्ताक्षर नहीं कराए गए। स्वयं कोषाध्यक्ष को यह जानकारी नहीं है कि कॉम्पीस्ट का फंड कौन और कैसे ऑपरेट कर रहा है, जो किसी भी संगठन के लिए अत्यंत चिंताजनक स्थिति मानी जाती है।
इसके अतिरिक्त, कॉम्पीस्ट में शुरुआत के समय केवल एक एजीएम (वार्षिक आमसभा) आयोजित की गई, उसके बाद बीते छह वर्षों से न तो एजीएम हुई और न ही कोई नियमित बैठक। इस दौरान एक भी नया सदस्य नहीं जोड़ा गया, जिससे संगठन की निष्क्रियता और विश्वसनीयता में गिरावट साफ झलकती है।


चेंबर ऑफ कॉमर्स: सक्रियता और पारदर्शिता का उदाहरण

दूसरी ओर, चेंबर ऑफ कॉमर्स की कार्यप्रणाली को व्यापारिक जगत में एक सक्रिय और लोकतांत्रिक मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। अध्यक्ष तेजकुल पाल सिंह पाली ने अपने कार्यकाल की समाप्ति पर स्वयं इस्तीफा देकर निष्पक्ष चुनाव कराने की पहल की, जो संस्था की पारदर्शी सोच को दर्शाता है
चेंबर ने स्वयं को राजनीतिक दलों से दूर रखते हुए केवल व्यापारिक हितों पर केंद्रित रखा। यही कारण है कि सत्ता परिवर्तन का चेंबर की गतिविधियों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा और संस्था निरंतर सक्रिय बनी रही।
कार्यप्रणाली की बात करें तो चेंबर ऑफ कॉमर्स में प्रत्येक माह नियमित बैठकें आयोजित की गईं, जिनमें व्यापारियों की समस्याओं, नीतिगत अड़चनों और व्यावहारिक समाधान पर चर्चा की गई। इसके साथ ही हर छह माह में एजीएम आयोजित कर सदस्यों को संगठन की गतिविधियों और निर्णय प्रक्रिया से जोड़ा गया।
पाली के कार्यकाल में चेंबर ने 500 नए सदस्यों को जोड़ा, जो व्यापारियों के बढ़ते विश्वास और संगठन की मजबूत साख को दर्शाता है। इसके अलावा, होली मिलन और दीपावली मिलन जैसे सामाजिक आयोजनों के माध्यम से व्यापारियों के बीच आपसी समन्वय और संवाद को भी बढ़ावा दिया गया।


दोनों संगठनों की तुलना में स्पष्ट अंतर
जहां कॉम्पीस्ट में चुनावों का अभाव, वित्तीय अपारदर्शिता, राजनीतिक निर्भरता और संगठनात्मक निष्क्रियता सामने आती है, वहीं चेंबर ऑफ कॉमर्स नियमित चुनाव, पारदर्शी कार्यशैली, सदस्य सहभागिता और निरंतर विस्तार का उदाहरण प्रस्तुत करता है।


व्यापारिक संगठनों का उद्देश्य केवल नाम भर का मंच बनना नहीं, बल्कि व्यापारियों की वास्तविक समस्याओं का समाधान और उनके हितों की रक्षा करना होता है। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट होता है कि चेंबर ऑफ कॉमर्स ने इस भूमिका को गंभीरता से निभाया, जबकि कॉम्पीस्ट की कार्यप्रणाली पर कई अनुत्तरित प्रश्न आज भी बने हुए हैं।


यह तुलना आने वाले समय में व्यापारिक समुदाय को यह सोचने का अवसर देती है कि उन्हें किस प्रकार के संगठन और नेतृत्व पर भरोसा करना चाहिए।