एएससीआई की सालाना शिकायत रिपोर्ट 2025-26: नियमों के उल्लंघन में सट्टेबाजी और रियल एस्टेट सबसे आगे; मामलों में 21% का उछाल
86% स्वैच्छिक अनुपालन (नियमों को खुद मानना): टीवी और प्रिंट मीडिया में यह दर 97% रही; 61% मामलों में बिना किसी विरोध के विज्ञापनदाताओं ने विज्ञापनों को हटा लिया या उनमें बदलाव कर दिया।
• 97.3% जांचे गए विज्ञापन: जिनमें नियमों के उल्लंघन की आशंका थी, वे डिजिटल मीडिया यानी इंटरनेट पर पाए गए।
एवीएस न्यूज. मुंबई
एडवर्टाइजिंग स्टाण्डर्ड्स काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) ने अपनी सालाना शिकायत रिपोर्ट 2025-2026 जारी की है। तमाम सरकारी रोक-टोक के बावजूद, विदेशों से चलने वाली सट्टेबाजी (ऑफशोर बेटिंग) से जुड़े विज्ञापन नियमों को तोड़ने में सबसे आगे रहे, जिनके खिलाफ सबसे ज़्यादा 6,933 मामले सामने आए। इसके बाद रियल एस्टेट (643 मामले), पर्सनल केयर यानी ब्यूटी प्रोडक्ट्स (576 मामले), खाने-पीने की चीजें (331 मामले) और 'ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज एक्ट' का उल्लंघन करने वाली दवाइयां या जादुई इलाज के दावे (274 मामले) रहे।
एएससीआईने साल 2025-26 में कुल 11,581 मामलों की जांच की, जो पिछले साल के मुकाबले 21% ज़्यादा है। ये मामले 9,841 विज्ञापनों से जुड़े थे, जिनकी संख्या में पिछले साल की तुलना में 37% की बढ़ोतरी हुई है। जांच किए गए विज्ञापनों में से 98% ऐसे निकले जिनमें बदलाव करने की ज़रूरत थी। खास बात यह है कि इनमें से 93% मामले खुद एएससीआई ने अपनी सक्रिय निगरानी के ज़रिए पकड़े।
गलत या भ्रामक विज्ञापनों के मामले में डिजिटल प्लेटफॉर्म्स यानी इंटरनेट सबसे आगे रहे, जहाँ कुल पकड़े गए विज्ञापनों का 97.3% हिस्सा देखा गया। इनमें से भी 82% विज्ञापन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पैसे देकर दिखाए गए यानी प्रायोजित थे। इंटरनेट पर होने वाले इन नियमों के उल्लंघनों में से अकेले 79.84% मामले मेटा (जैसे फेसबुक और इंस्टाग्राम) प्लेटफॉर्म्स पर पाए गए।
यह रिपोर्ट इस बात पर ज़ोर देती है कि कैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की तेज़ रफ़्तार और पहुंच का इस्तेमाल गुमराह करने वाले और नुकसानदेह विज्ञापनों को बढ़ावा देने के लिए किया जा रहा है। कुल उल्लंघनों में से, नुकसानदेह प्रोडक्ट्स या स्थितियों को बढ़ावा देने वाले विज्ञापन 75.4% मामलों के लिए ज़िम्मेदार थे, जबकि भ्रामक दावों वाले विज्ञापन 27.5% रहे। ये आंकड़े बताते हैं कि उपभोक्ताओं की सुरक्षा का जोखिम अब सिर्फ़ गलत जानकारी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कानूनन प्रतिबंधित चीज़ों को बढ़ावा देना भी शामिल हो चुका है।
यह बात खासतौर पर विदेशों से चलने वाली सट्टेबाजी पर लागू होती है, जहाँ बहुत तेज़ी से नया कंटेंट और विज्ञापन बनाए जाते हैं और उन्हें अलग-अलग प्लेटफॉर्म्स पर फैलाया जाता है। ये विज्ञापन सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स, संबधित नेटवर्क्स, सोशल मीडिया ग्रुप्स और मैसेजिंग ऐप्स के ज़रिए धड़ल्ले से बांटे जा रहे हैं, जिससे इन्हें पहचानना और इन पर निगरानी रखना और भी मुश्किल हो जाता है। अप्रैल और दिसंबर 2025 के बीच, इन्फ्लुएंसर्स द्वारा नियमों के उल्लंघन के 854 मामले सामने आए, जिनमें कुछ अकाउंट्स तो पूरी तरह से सट्टेबाजी के कंटेंट के लिए ही बने थे।
सट्टेबाजी के अलावा भी इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग (डिजिटल कलाकारों द्वारा प्रचार) चिंता का एक बड़ा विषय बनी हुई है। पिछले वित्त वर्ष के दौरान जांचे गए 1,609 इन्फ्लुएंसर विज्ञापनों में से 97.3% में बदलाव करने की ज़रूरत पाई गई, और इनमें से 54% से ज़्यादा विज्ञापन उन चीज़ों के थे जो कानूनी तौर पर प्रतिबंधित हैं या जिनके प्रचार पर रोक है। इन्फ्लुएंसर्स द्वारा नियम तोड़ने वाले टॉप पांच क्षेत्रों में अवैध सट्टेबाजी (54%), पर्सनल केयर (16.9%), इलेक्ट्रॉनिक्स और कंज्यूमर ड्यूरेबल्स (7.9%), खान-पान (6.3%), और फैशन व लाइफस्टाइल (4.3%) शामिल रहे।
ब्यूटी, पर्सनल केयर और खान-पान (फूड एंड बेवरेज) से जुड़ी कैटेगरीज़ में यह देखा गया कि विज्ञापनों में बढ़ा-चढ़ाकर दावे करने, सेहत से जुड़े झूठे फायदे बताने और विज्ञान के नाम पर फर्जी दावे करने का चलन बहुत ज़्यादा रहा।
मसलन, पर्सनल केयर (ब्यूटी प्रोडक्ट्स) में सबसे आम उल्लंघन त्वचा में बदलाव, बालों के उगने या तुरंत असर दिखने जैसे बिल्कुल साफ़, तेज़ या गारंटीड नतीजों के दावों से जुड़े हैं। वैज्ञानिक सबूत न होने की वजह से इन शिकायतों को सही माना गया, खासकर तब जब दावों को पक्का या सब पर असर करने वाला बताया गया था। इसके अलावा विज्ञापनों में असंभव समय-सीमा (जैसे "1 वॉश" में डैंड्रफ खत्म), बढ़ा-चढ़ाकर बताई गई वैज्ञानिक सटीकता ("11.7 गुना मज़बूत बाल"), खुद को सबसे ऊपर बताना ("इंडिया'ज़ नंबर 1") और प्रॉडक्ट को "प्राकृतिक" व "सुरक्षित" दिखाने वाले दावे भी शामिल थे।
खान-पान (फूड एंड बेवरेज) के क्षेत्र में नियम तोड़ने वाले मामले मुख्य रूप से मेटाबॉलिक हेल्थ (पाचन और ऊर्जा), पुरानी बीमारियों, बच्चों के विकास, फर्टिलिटी (प्रजनन क्षमता) और अंगों के कामकाज से जुड़े भ्रामक या बिना सबूत वाले दावों के इर्द-गिर्द घूमते रहे। ये दावे वजन घटाने वाले सप्लीमेंट्स, बच्चों के विकास के फॉर्मूले और यहाँ तक कि "पीने वाली सनस्क्रीन" जैसे प्रोडक्ट्स के लिए किए गए थे।
न्यूट्रास्यूटिकल्स प्रोडक्ट्से के बढ़ते चलन ने भोजन और दवा के बीच के अंतर को धुंधला कर दिया है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) के नियमों के तहत इन्हें भोजन की श्रेणी में रखा गया है, लेकिन विज्ञापनों में इनके फायदे अक्सर बीमारियों के इलाज और दवाइयों जैसे बताए जाते हैं। खान-पान की श्रेणी में न्यूट्रास्यूटिकल्स सबसे उप-श्रेणी रही, जो इस क्षेत्र के कुल मामलों में 52% की हिस्सेदार थी और इनमें से 96% विज्ञापनों में बदलाव करने की ज़रूरत पड़ी।
कुल मिलाकर, अपनी मर्ज़ी से नियमों को मानने की दर 83% से बढ़कर 86% हो गई, जिसमें टीवी और प्रिंट मीडिया ने 97% के साथ नियमों का लगभग पूरा पालन किया। जांच किए गए विज्ञापनों में से 61% पर विज्ञापनदाताओं ने कोई आपत्ति नहीं जताई और नोटिस मिलते ही तुरंत उन्हें हटा लिया या उनमें बदलाव कर दिया। यह दिखाता है कि उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिए पहली कतार के तौर पर खुद से नियमों का पालन करने की यह व्यवस्था तेज़ी से और बेहतर तरीके से काम कर रही है।






